इस बार शनि जयंती के साथ सौभाग्य और शोभन योग में वट सावित्री व्रत रखेंगी सुहागिन महिलाएं
व्रत को लेकर महिलाओं में उत्साह,व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा होगी,-पति के दीर्घ जीवन के लिए बरगद (वट), पीपल पेड़ की परिक्रमा भी
वाराणसी, 15 मई । ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर शनिवार को उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में सुहागिन महिलाएं अपने पति के सुदीर्घ स्वस्थ जीवन के लिए वट सावित्री व्रत रखेंगी। श्रद्धालु व्रती महिलाएं विधि विधान से सावित्री माता की पूजा करेंगी। पूजा के बाद बरगद (वट), पीपल पेड़ की परिक्रमा कर माता सावित्री से अटल सौभाग्य की कामना करेंगी। वट सावित्री पूजन के लिए उत्साहित महिलाएं शुक्रवार को व्रत की तैयारियों में जुटी रही।
काशी तीर्थ पुरोहित सभा के अध्यक्ष व धर्मकूप (मीरघाट-दशाश्वमेध) स्थित वट सावित्री माता मंदिर के प्रधान पुरोहित पं कन्हैया लाल त्रिपाठी के अनुसार वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है, खासकर विवाहित महिलाओं के लिए। यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को किया जाता है। हालांकि, उत्तर भारत की महिलाएं इसे एक दिन पहले करती हैं, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत की महिलाएं इसे उत्तर भारतीयों से 15 दिन बाद करती हैं। इस दिन विशेष रूप से बरगद के पेड़ की पूजा करना अनिवार्य होता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश बरगद के पेड़ में निवास करते हैं।
उन्होंने बताया कि इस बार 2026 में ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 16 मई को सुबह 05:11 से शुरू हो रही है। इसका समापन रविवार को अपरान्ह 1.30 बजे होगा। ऐसे में वट सावित्री व्रत शनिवार 16 मई को ही मनेगी। इस बार वट सावित्री व्रत पर शनि जयंती के साथ सौभाग्य और शोभन योग का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा ग्रहों की स्थिति के कारण बुधादित्य, नवपंचम, गजलक्ष्मी, विपरीत राजयोग जैसे राजयोगों का भी निर्माण हो रहा है। वट सावित्री व्रत पर पूजा के लिए सबसे उत्तम समय सुबह 07:12 बजे से 08:24 बजे तक है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा की जाती है, जो पूर्वांह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक है।
पिशाचमोचन कुंड (विमल तीर्थ)के कर्मकांडी प्रदीप पांडेय बताते हैं कि सनातन हिन्दू धर्म में बरगद को देव वृक्ष माना गया है। इसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव रहते हैं। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म से मृत पति को फिर से जीवित कराया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत रखा जाता है।
—इसीलिए मनाया जाता है वट सावित्री व्रत
पौराणिक कथा है कि भद्र देश के राजा की पुत्री सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए वटवृक्ष के नीचे ही उनका पार्थिव शरीर रख वटवृक्ष पूजन किया था। जब पति सत्यवान के प्राण लेकर यमराज जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दी। सावित्री के पतिव्रता धर्म के आगे बेबस यमराज ने उनसे वरदान मांगने को कहा। इस पर सावित्री ने यमराज से पहला वरदान सास-ससुर को नेत्र ज्योति देने, दूसरा वरदान पुत्रवती होने का मांगा। यमराज तथास्तु कह सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल दी। यमराज ने मुड़कर देखा वरदान देने के बाद भी सावित्री पीछे आ रही है तो रूक कर सवालिया निगाह से देखा। इस पर सावित्री ने कहा कि पति को आप ले जा रहे हैं तो मैं पुत्रवती कैसे होऊंगी। यह सुन यमराज को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने सत्यावान के प्राण वापस कर दिए। ऐसी मान्यता है कि सावित्री ने वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख पूजन कर उनके प्राणों को वापस पाया था। इसी मान्यता के तहत वट सावित्री पूजन किया जाता है।