उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार में भी सबका साथ-सबका विकास
उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार में भी सबका साथ-सबका विकास
पश्चिम बंगाल में सरकार गठन के ठीक दूसरे दिन उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मौजूदा कार्यकाल के अपने दूसरे मंत्रिमंडल विस्तार को अमली जामा पहना दिया है। इस विस्तार के साथ उत्तर प्रदेश में मंत्रियों की संख्या 60 हो गई है। वर्ष 2024 में अगर जितिन प्रसाद और अनूप प्रधान सांसद न चुने गए होते तो आज यह संख्या 62 होती। हालांकि याेगी कैबिनेट में 60 से अधिक मंत्री रखने की व्यवस्था नहीं है। उत्तर प्रदेश में मंत्रिपरिषद का दबाव मुख्यमंत्री पर पहले से ही था लेकिन उसे मूर्त रूप 10 मई को मिल सका है। देर आयद-दुरुस्त आयद वाली कहावत इस मंत्रिपरिषद विस्तार में बखूबी चरितार्थ हुई है। कुछ लोग इसे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से भी जोड़कर देख रहे हैं।
राजनीति की सामान्य समझ रखने वालों की मानें तो इस मंत्रिमडल विस्तार में छह नए मंत्रियों के जरिए जहां पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को साधने की कोशिश की गई है, बुंदेलखंड और पूर्वांचल को साधने के प्रयास भी हुए हैं। भाजपा ने सर्व समाज को यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश की है कि सबका साथ, सबका विकास उसके लिए महज सियासी नारा नहीं बल्कि अपनी कार्यशैली और रीति-नीति में भी इसका बखूबी ख्याल रखती है। इस लिहाज से भी इस विस्तार को हल्के में लेना उचित नहीं होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंत्रिपरिषद के विस्तार से जातिगत जनगणना का राग अलाप रही समाजवादी पार्टी के पैरों के नीचे से एक तरह से जमीन खिसका दी है।
सपा के बागी विधायक व पूर्व मंत्री मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाकर जहां उन्होंने ब्राह्मण समाज को भाजपा से जोड़ने का जतन किया है, वहीं भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिलाकर यह बताने और जताने का प्रयास भी हुआ है कि भाजपा अपने पुराने चावलों की उपेक्षा नहीं करती। अन्य दल से अपने साथ आए साथियों की अनदेखी का तो सवाल ही नहीं। भूपेंद्र चौधरी राज्य के समाज कल्याण मंत्री रहे हैं। उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में भी उनका कार्यकाल बेहद शानदार रहा है। जाट समाज से उनका ताल्लुकात है। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को बल मिलना स्वाभाविक है। भूपेंद्र चौधरी जहां जाट समुदाय में भाजपा के बड़े चेहरे हैं, वहीं पंचायती राज मंत्री के रूप में उनके काम की गूंज प्रदेश के गांव-गांव में है। यह और बात है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा था और अब जब पंकज चाैधरी के रूप में भाजपा को उत्तर प्रदेश में नया प्रदेश अध्यक्ष मिल गया है तो फिर भूपेंद्र चौधरी की योगी मंत्रिमंडल में तीसरी बार ताजपोशी तो बनती ही थी।
अजीत पाल और सोमेंद्र तोमर को मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है। अजीत पाल की पाल-गड़ेरिया समाज के बीच अच्छी पकड़ है। जाहिर है कि इसका फायदा साल 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिल सकता है। हंसराज विश्वकर्मा की वाराणसी, चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र और भदोही जिले में अच्छी पकड़ है। वे पिछड़ी जाति से आते हैं। कन्नौज जिले के तिर्वा विधानसभा क्षेत्र के विधायक कैलाश राजपूत का अपने लोधी समाज पर राजनीतिक प्रभाव है। चार बार की विधायक रहीं कृष्णा पासवान को राज्य मंत्री बनाया गया है। उन्होंने आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। ऐसे में जो राजनीतिक दल भाजपा को दलित विरोधी ठहराने में जुटे हुए थे, योगी सरकार के इस निर्णय से उन्हें भी जोर का राजनीतिक झटका लगा है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रति किए गए सरकार के काम और उनके बीच की एक महिला को मंत्री बनाए जाने के बाद उन्हें जो गौरव की अनुभूति हुई होगी, वह किसी उपलब्धि से कम नहीं है।
राज्यमंत्री बनाई गईं पूजा पाल किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। बसपा से अपना राजनीतिक करियर आरंभ करने वाली पूजा पाल सपा में भी विधायक रही हैं। और अब भाजपा के साथ हैं। अपने पति राजू पाल की हत्या के बाद वे सुर्खियों में आई थीं। अलीगढ़ के खैर से विधायक सुरेंद्र दिलेर को भी राज्य मंत्री बनाया गया है। उनकी अपनी फैन फालोइंग है। मतलब मंत्रिमंडल विस्तार के बहाने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष को घेरने के लिए जबर्दस्त क्रौंच व्यूह बना दिया है। उसने मंत्रियों के चयन में अनुभव को तो वरीयता दी ही, सामाजिक संतुलन की आधारभूमि भी तलाशी है, यह अपने आप में सुखद संदेश है।
कहना न होगा कि योगी-2 सरकार का पहला कैबिनेट विस्तार 5 मार्च, 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ था। इस विस्तार में चार मंत्रियों को शपथ दिलाई गई थी, इनमें सपा से गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ आए सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर, दारा सिंह चौहान, रालोद कोटे से अनिल कुमार और भाजपा के सुनील शर्मा को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। संवैधानिक व्यवस्था के तहत योगी कैबिनेट में कुल 60 विधायक मंत्री बनाए जा सकते हैं। शेष 6 रिक्त पदों को भरकर मोदी सरकार ने जहां अपने मंत्रिमंडल का संपूर्ण गठन कर लिया है, वहीं इसी बहाने राजनीतिक, सामाजिक समीकरण के कील-कांटे भी ठीक कर लिए हैं।
वैसे भी राजनीति में कुछ भी अकारण नहीं होता और भाजपा में तो जो कुछ भी होता है, सुचिंतित और व्यवस्थित तरीके से होता है। वहां अकारण होने का ताे प्रश्न ही नहीं होता। पश्चिम बंगाल की जीत के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश की चर्चा की थी। तभी लगने लगा था कि भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर कुछ नया और बड़ा करने वाली है। पश्चिम बंगाल में शपथ ग्रहण के एक दिन बाद ही हुए छह नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण को इसी रूप में देखा जा सकता है।
भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार में जिस तरह अगड़ों, पिछड़ों और दलितों को साथ लेकर आगे बढ़ने का निर्णय लिया है, उसकी सकारात्मक परिणिति तो देर-सवेर होनी ही है। वैसे भी नए मंत्रियों के पास काम करने के लिए अभी दस माह से अधिक समय है। 25 मार्च 2022 को योगी सरकार ने दोबारा शपथ ली थी। दस माह भी कम नहीं होते। कहना न होगा कि योगी सरकार रोज निर्णय लेने के लिए जानी जाती है। कैबिनेट की जितनी बैठकें उसके कार्यकाल में हुई हैं, उतनी शायद ही किसी अन्य मुख्यमंत्री के कार्यकाल में हुई होगी।
नए मंत्रियों ने शपथ ले ली है। जाे लाेग कल तक मंत्रिमंडल विस्तार काे लेकर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल उठा रहे थे या वे जाे दूसरे दलाें से आए और प्रतीक्षा अवधि के बढ़ने से निराश-हताश हाे रहे थे, उन सबकाे शायद अपेक्षित जवाब मिल गया है। वे समझ गए हैं कि यहां प्रदेश के विकास और विरासत की ही नहीं, साथ थाने वालाें के हिताें की भी चिंता हाेती है। यहां देर ताे हाे सकती है, मगर अंधेर हाेने का सवाल नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि उत्तर प्रदेश और व्यवस्थित तरीके से सर्वोत्तम प्रदेश बनने की राह पर आगे बढ़ सकेगा।