गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी न देना अब एक नियमित प्रक्रिया बन गई है : हाईकोर्ट

गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी न देना अब एक नियमित प्रक्रिया बन गई है : हाईकोर्ट

गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी न देना अब एक नियमित प्रक्रिया बन गई है : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 03 जून । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में पुलिस स्टेशन में गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी न देना और खुलासा ज्ञापन तैयार न करना ‘नियमित प्रथा’ बन गई है। इन उल्लंघनों को ध्यान में रखते हुए, न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने हत्यारोपित (संदीप बैसोया) को जमानत दे दी, जो 13 जनवरी से जेल में है।

हाईकोर्ट के समक्ष, आरोपित ने दावा किया कि उसे न तो गिरफ्तारी के आधार बताए गए थे और न ही उसके द्वारा कथित तौर पर बताई गई देसी पिस्तौल को बरामद करने से पहले कोई खुलासा ज्ञापन (पंचनामा) तैयार किया गया था। उन्होंने सह-आरोपी के साथ समानता का भी दावा किया, जिसे पहले उच्च न्यायालय की एक पीठ द्वारा जमानत दी गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान, राज्य की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने इस बात से इनकार नहीं किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड आदेश पारित किए जाने तक किसी भी स्तर पर आवेदक को गिरफ्तारी का आधार नहीं बताया गया था।

राज्य के हलफनामे में इस बात पर भी चुप्पी साधी गई थी कि क्या बरामदगी की कार्यवाही शुरू करने से पहले पुलिस स्टेशन में खुलासा ज्ञापन तैयार किया गया था, जैसा कि सर्वाेच्च न्यायालय ने सुब्रमण्य बनाम कर्नाटक राज्य, 2022 में आवश्यक बताया था। राज्य के हलफनामे पर विचार करते हुए, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस के लिए बरामदगी की कार्यवाही शुरू करने से पहले पुलिस स्टेशन में आरोपित द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित पंचनामा (खुलासा ज्ञापन) तैयार करना अनिवार्य है।

गिरफ्तारी के आधारों की आपूर्ति न करने के संबंध में, पीठ ने सर्वाेच्च न्यायालय के विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और अन्य 2025 के फैसले पर ध्यान दिया, जिसमें यह माना गया था कि गिरफ्तारी के समय या कम से कम रिमांड के आदेश से दो घंटे पहले आरोपित को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए जाने चाहिए। न्यायालय ने आगे कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए रिमांड देने से पहले यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) का अनुपालन किया गया है या नहीं।

इस प्रकार कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को इस मामले की जांच करने और अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को उचित निर्देश जारी करने का निर्देश दिया। इसके अलावा कोर्ट ने रिमांड आदेश में भी खामी पाई, जिसे उसने ‘मुद्रित प्रोफार्मा के अलावा कुछ नहीं’ बताया, जिसे बाद में गाजियाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा भरा और हस्ताक्षरित किया गया था।

इस पर आपत्ति जताते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की-‘यह न केवल गाजियाबाद के मुख्य न्यायिक न्यायाधीश द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग न करना है, बल्कि विहान कुमार के मामले में सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देश का स्पष्ट उल्लंघन भी है, इसलिए यह न्यायालय गाजियाबाद के मुख्य न्यायिक न्यायाधीश को उनकी सेवा अवधि को ध्यान में रखते हुए भविष्य में अधिक सतर्क रहने का निर्देश देता है।’

मामले में प्रक्रियात्मक खामियों को ध्यान में रखते हुए और जमानत प्राप्त सह- आरोपित को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया।