पति की नेट इनकम का 25% गुजारा-भत्ता तय करना जरूरी नहीं, कोर्ट कम या ज्यादा भी दे सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
कोर्ट कम या ज़्यादा भी दे सकता है
प्रयागराज, 13 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25फीसद गुज़ारा-भत्ता देने का जो पैमाना (बेंचमार्क) अक्सर इस्तेमाल किया जाता है, वह सिर्फ़ एक "सामान्य गाइडलाइन" है, न कि कोई अनिवार्य नियम। जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने साफ़ किया कि हर मामले के तथ्यों के आधार पर कोर्ट के पास कम या ज़्यादा भत्ता तय करने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि गुज़ारा-भत्ता तय करने के लिए "नेट इनकम" का मतलब आम तौर पर ज़रूरी कटौतियों और टैक्स के बाद बची हुई इनकम से होता है, न कि ग्रॉस सैलरी से।
कोर्ट असल में दो क्रिमिनल रिविज़न याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था: एक पत्नी ने कानपुर देहात की फ़ैमिली कोर्ट द्वारा तय 12,000 हजार के मासिक गुज़ारे-भत्ते को बढ़ाने के लिए दायर की थी, और दूसरी पति ने उसी फ़ैसले को चुनौती देते हुए दायर की। यह बात मानी गई कि पति ने पत्नी के ख़िलाफ़ तलाक़ की अर्ज़ी दायर की, और फ़ैसला उसके पक्ष में आया। इस पर बात करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि सिर्फ़ तलाक़ का फ़ैसला (डिक्री) आने से ही कोई कानूनी रूप से ब्याही पत्नी गुज़ारा-भत्ता पाने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाती, बशर्ते वह अपना गुज़ारा करने में असमर्थ हो और उसने दोबारा शादी न की हो या वह व्यभिचार में न रह रही हो।
बेंच ने कहा, "गुज़ारा-भत्ते का मकसद यह पक्का करना है कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके, न कि सिर्फ़ ज़िंदा रहे।" बेंच ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में यह बात आई कि पत्नी के पास इनकम का कोई पर्याप्त ज़रिया नहीं था और वह अपना गुज़ारा करने में असमर्थ थी, जबकि पति के पास इनकम का पर्याप्त ज़रिया था। इसलिए, वह गुज़ारा-भत्ता पाने की हकदार थी, क्योंकि तलाक़ के बाद उसने दोबारा शादी नहीं की। अपने अधिकार क्षेत्र के बारे में बेंच ने कहा कि रिविज़न कोर्ट आम तौर पर गुज़ारा-भत्ते की रकम को बढ़ा या घटा नहीं सकती।
बेंच ने आगे कहा, "भले ही ट्रायल कोर्ट ने बहुत कम रकम तय की हो, हाईकोर्ट रिविज़न में उसे बढ़ा नहीं सकता," और जोड़ा कि रिविज़न कोर्ट की शक्ति सुपरवाइजरी (निगरानी वाली) होती है, न कि अपीलीय। हालांकि, बेंच ने साफ़ किया कि दखल तब ज़रूरी हो जाता है जब ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष गलत या तर्कहीन हों, जब ज़रूरी सबूतों को नज़रअंदाज़ किया गया हो, या जब स्थापित सिद्धांतों को गलत तरीके से लागू किया गया हो, जिससे गंभीर अन्याय या परेशानी हुई हो। इस स्थिति को देखते हुए बेंच ने पाया कि पति की कुल मासिक सैलरी 86 हजार 674 थी, जिसमें से 67 हजार 043 उसके बैंक अकाउंट में जमा हो रहे थे।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज़ी सबूतों पर विचार किए बिना जल्दबाजी में गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) की रकम तय की थी, खासकर इसलिए, क्योंकि पति 'रजनीश बनाम नेहा' मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार अपनी संपत्ति और देनदारियों के बारे में हलफनामा दाखिल करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया कि चूंकि फैमिली कोर्ट ने मानी गई आय को नजरअंदाज किया और रिकॉर्ड से समर्थित न होने वाला अपना ही निष्कर्ष निकाला, इसलिए गुजारा-भत्ते की रकम पर किए गए फैसले को बदलना और गलती को सुधारना जरूरी है।
कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट पति की वास्तविक आय और महंगाई की मौजूदा दर पर ठीक से विचार करने में नाकाम रहा है। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि निचली अदालत द्वारा तय 12,000 की रकम पत्नी के गुजारे के लिए न तो उचित थी और न ही पर्याप्त, हाईकोर्ट ने पत्नी की रिवीजन याचिका को मंजूर कर लिया और मासिक गुजारा-भत्ता बढ़ाकर 20,000 किया, जिसका भुगतान मूल आवेदन की तारीख से किया जाना है।