बायोडायवर्सिटी लॉ के पेपर में मिले शून्य अंक, छात्र की याचिका खारिज
बार काउंसिल और लॉ कमीशन को भेजी जाएगी कॉपी
प्रयागराज, 07 अगस्त ।इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीए एलएलबी नौवें सेमेस्टर की "बायो-डायवर्सिटी प्रोटेक्शन लॉ" परीक्षा में शून्य अंक पाने वाले एक छात्र की पुनर्मूल्यांकन याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने यह आदेश विंध्य वासिनी प्रसाद पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में सुनाया।
याचिकाकर्ता प्रयाग विधि महाविद्यालय, मुवैया, नैनी का छात्र है, जो प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) विश्वविद्यालय से संबद्ध है। 18 मार्च 2026 को घोषित परिणाम में उसे इस विषय में शून्य अंक मिले, जबकि उसने सभी प्रश्न हल किए थे और 50 से अधिक अंक की उम्मीद कर रहा था। सूचना के अधिकार के तहत उत्तर पुस्तिका की प्रति लेने के बाद छात्र ने पुनर्मूल्यांकन की मांग की, लेकिन विश्वविद्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने विश्वविद्यालय को मूल प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका पेश करने का निर्देश दिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्टैंडिंग काउंसल से एक प्रश्न (3-सी) का उत्तर पढ़ने को कहा। उत्तर सुनने के बाद स्वयं वकील ने स्वीकार किया कि उसे उत्तर का कोई अर्थ समझ नहीं आया और उसमें न कोई तार्किकता थी, न कानूनी समझ। कोर्ट ने भी पाया कि उत्तर पुस्तिका में विषय से जुड़ी कोई समझ नहीं झलकती।
न्यायालय ने कहा कि अकादमिक मूल्यांकन में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा बेहद सीमित है, जब तक कि मनमानी, दुर्भावना या स्पष्ट प्रक्रियागत त्रुटि साबित न हो। रिकॉर्ड की जांच में न्यायालय को परीक्षक की ओर से कोई मनमानी नहीं मिली।
हालांकि न्यायालय ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है , ऐसे मामले बार-बार कोर्ट के सामने आ रहे हैं, जो कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर को दर्शाता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि हो सकता है छात्र को उचित मार्गदर्शन, ओरिएंटेशन और शिक्षण न मिला हो, इसलिए दोष केवल छात्र का नहीं बल्कि संस्थान का भी है।
न्यायालय ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को निर्देश दिया कि इस आदेश, प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका (छात्र की पहचान छिपाकर) की प्रति बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और लॉ कमीशन ऑफ इंडिया के मेंबर सेक्रेटरी को भेजी जाए, ताकि वे संस्थान के अकादमिक मानकों और कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर विचार कर सकें। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां किसी संस्थान, शिक्षक या परीक्षक के खिलाफ निष्कर्ष नहीं मानी जाएं।