Allahabad High Court: 21 साल पुराने हत्या केस में बड़ा फैसला, सबूतों की कमी पर दो आरोपी बरी; उम्रकैद की सजा रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मैनपुरी के 2005 के वीरपाल सिंह हत्याकांड में अभियोजन की कहानी को संदेह से परे साबित न होने पर औशन सिंह और जीत राज को राहत दी
प्रयागराज, 11 सितंबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 2005 के हत्या के मामले में आरोपी सुकराम, औशन सिंह और जीत राज को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलार्थी हत्या करने में शामिल थे। हालांकि, चिकित्सा साक्ष्यों से वीरपाल सिंह की मौत गोली लगने से हुई, हत्या का अपराध साबित हुआ, लेकिन आरोपियों की संलिप्तता संदेह से परे प्रमाणित नहीं हो सकी।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने यह आदेश सुकराम व अन्य की ओर से वर्ष 2007 में दाखिल आपराधिक अपील पर दिया। मैनपुरी की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 26 फरवरी 2007 को तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और दस-दस हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने इस फैसले को निरस्त कर दिया।
अभियोजन के अनुसार तीन अगस्त 2005 की सुबह करीब आठ बजे वीरपाल सिंह अपने घर के सामने चबूतरे पर चचेरे भाई खुशीराम के साथ खड़े थे। आरोप था कि सुकराम, औशन सिंह, जीत राज और मनुराज सिंह हथियारों से लैस होकर वहां पहुंचे और गोलीबारी कर दी। वीरपाल को गोली लगी और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई। मामले की रिपोर्ट खुशीराम ने थाना बेवर, मैनपुरी में दर्ज कराई थी।
उच्च न्यायालय ने मुख्य गवाह खुशीराम की मौजूदगी और उसकी गवाही पर गंभीर सवाल उठाए। वह घटना के समय सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक था, जबकि स्कूल का समय सुबह सात बजे से दोपहर तक था। उसने अपनी मौजूदगी की वजह छुट्टी और पंचायत चुनाव से जुड़े काम को बताया, लेकिन चुनावी रंजिश का उल्लेख एफआईआर और उसके शुरुआती बयान में नहीं था। कोर्ट ने यह भी पाया कि पुरानी पारिवारिक रंजिश पहले ही खत्म हो चुकी थी।
पीठ ने कहा कि मामले में स्वतंत्र गवाह का अभाव, गवाहों की मौजूदगी को लेकर विरोधाभास, पुलिस की जीडी और घटनाक्रम में अस्पष्टता, शव की आवाजाही का संतोषजनक रिकॉर्ड न होना, हथियारों की बैलिस्टिक जांच नहीं कराया जाना और स्कूल रिकॉर्ड से गवाह की मौजूदगी सत्यापित नहीं करना जैसी कमियां थीं। इन सभी परिस्थितियों का सामूहिक प्रभाव अभियोजन की कहानी को संदेह से परे स्वीकार करने में बाधक है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने या किसी वैकल्पिक हमलावर की पहचान करने की बाध्यता नहीं है। अभियोजन को अपने साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित करना होता है। ऐसा नहीं होने पर बचाव पक्ष की कमजोरियों के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए तीनों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। सुकराम की अपील उसकी मृत्यु के कारण पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए फैसला औशन सिंह और जीत राज के संबंध में प्रभावी रहा।