इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: स्पेशल टीईटी से इन-सर्विस शिक्षकों को भविष्य की भर्ती में नहीं मिलेगी अतिरिक्त वरीयता

कोर्ट ने कहा- स्पेशल टीईटी केवल अनिवार्य योग्यता हासिल करने का मौका, नियमित टीईटी पास अभ्यर्थियों की नियुक्ति के अधिकार पर नहीं पड़ेगा असर

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: स्पेशल टीईटी से इन-सर्विस शिक्षकों को भविष्य की भर्ती में नहीं मिलेगी अतिरिक्त वरीयता

प्रयागराज, 07 अक्टूबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पहले से सेवा में कार्यरत शिक्षकों के लिए स्पेशल शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी स्पेशल आयोजित करने का फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं करता।

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह विशेष परीक्षा केवल इन-सर्विस शिक्षकों को वह अनिवार्य योग्यता हासिल करने का अवसर देती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए जरूरी माना है। इससे नियमित टीईटी पहले ही पास कर चुके उम्मीदवारों की तुलना में इन शिक्षकों को भविष्य की भर्ती में कोई अतिरिक्त वरीयता नहीं मिलती।

जस्टिस मंजू रानी चौहान ने प्रतीक मिश्रा व अन्य की याचिका पर आदेश पारित कर कहा कि योग्यता हासिल करना और नियुक्ति में वरीयता मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। जब तक स्पेशल टीईटी का उद्देश्य केवल इन-सर्विस शिक्षकों को निर्धारित समय सीमा के भीतर अनिवार्य योग्यता हासिल करने का अवसर देना है, तब तक सरकार के फैसले में किसी तरह का पक्षपातपूर्ण लाभ नहीं माना जा सकता।

मामला उन अभ्यर्थियों की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने पहले ही नियमित टीईटी पास कर लिया है और सहायक अध्यापक के पदों पर रिक्तियों के विज्ञापन का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के 2 सितंबर 2026 के शासनादेश और उसके बाद 3 सितंबर 2026 को जारी ज्ञापन को चुनौती दी। इन आदेशों के तहत राज्य सरकार ने इन-सर्विस शिक्षकों और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए स्पेशल टीईटी आयोजित करने का फैसला किया। याचिकाकर्ताओं की आपत्ति मुख्य रूप से इन-सर्विस शिक्षकों के लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने को लेकर थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 23(1) के तहत न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने का अधिकार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद यानी एनसीटीई से अधिकृत शैक्षणिक प्राधिकरण के पास है। उनका कहना था कि कानून या एनसीटीई के दिशा-निर्देशों में राज्य सरकार को इन-सर्विस शिक्षकों के लिए अलग या अलग तरीके से तैयार की गई टीईटी कराने का अधिकार नहीं दिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि स्पेशल टीईटी के जरिए इन शिक्षकों के लिए पात्रता के मानकों में ढील दी जा सकती है और उन्हें केवल परीक्षा पास कराने की औपचारिकता पूरी करने का अवसर दिया जा सकता है। इससे पहले से टीईटी पास कर चुके अभ्यर्थियों के सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति के लिए विचार किए जाने के अधिकार पर असर पड़ने की आशंका जताई गई।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि स्पेशल टीईटी का आयोजन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में किया जा रहा है। सरकार ने बताया कि 2, 3 और 4 जुलाई 2026 को आयोजित नियमित टीईटी के लिए 19,94,661 आवेदन आए और इसका परिणाम 26 अगस्त 2026 को घोषित किया गया। याचिकाकर्ताओं ने इस परीक्षा या इसके परिणाम को चुनौती नहीं दी है। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि जब याचिकाकर्ता खुद टीईटी पास कर चुके हैं तो उनकी कोई वास्तविक शिकायत बाकी नहीं रह जाती।

उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की चुनौती एक गलत धारणा पर आधारित है, क्योंकि सरकार के शासनादेश में न तो टीईटी की अनिवार्यता खत्म की गई और न ही इन-सर्विस शिक्षकों को टीईटी से छूट दी गई। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं को सार्वजनिक रोजगार के अवसर को प्रभावित करने वाली सरकारी कार्रवाई को चुनौती देने का कानूनी अधिकार है, लेकिन वास्तविक सवाल यह है कि क्या सरकार के फैसले से उन्हें ऐसा कोई कानूनी नुकसान हुआ है, जिसे कानून मान्यता देता है या इन-सर्विस शिक्षकों के पक्ष में कोई असंवैधानिक वरीयता पैदा हुई।

न्यायालय ने पाया कि राज्य सरकार ने इन-सर्विस शिक्षकों के लिए कोई पद आरक्षित नहीं किए। उन्हें अतिरिक्त अंक, विशेष वेटेज या कोई अन्य छूट भी नहीं दी गई। सरकार ने यह भी नहीं कहा है कि भविष्य की भर्ती में इन-सर्विस शिक्षकों को याचिकाकर्ताओं की तुलना में प्राथमिकता दी जाएगी। हाईकोर्ट ने कहा कि स्पेशल टीईटी के जरिए इन-सर्विस शिक्षकों द्वारा निर्धारित योग्यता हासिल करने का केवल इतना मतलब है कि वे भी न्यूनतम निर्धारित योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। इससे उन्हें नियुक्ति का कोई अतिरिक्त अधिकार या प्राथमिकता हासिल नहीं होती। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल टीईटी पास कर लेने से भविष्य की रिक्तियों पर नियुक्ति का कोई स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता। जब तक रिक्तियों का विज्ञापन जारी नहीं होता और चयन प्रक्रिया शुरू नहीं होती, तब तक किसी उम्मीदवार को यह दावा करने का अधिकार नहीं है कि उसे किसी विशेष पद पर नियुक्त किया ही जाएगा।

उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की टीईटी योग्यता वैध है और सरकार के फैसले से उनकी मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा कि संविधान में समानता की गारंटी का इस्तेमाल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि राज्य किसी दूसरे वर्ग के उम्मीदवारों को निर्धारित न्यूनतम योग्यता हासिल करने का अवसर ही न दे। समान अवसर का मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक उम्मीदवार हमेशा योग्यता के एक ही स्तर पर बना रहे। इसका मतलब यह है कि जब भर्ती प्रक्रिया शुरू हो तो उस भर्ती के लिए समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ कानून के अनुसार व्यवहार किया जाए और किसी को मनमाना लाभ न दिया जाए।

उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने भविष्य में होने वाली किसी भर्ती प्रक्रिया की वैधता पर कोई राय नहीं दी है। यदि आगे चलकर भर्ती प्रक्रिया में इन-सर्विस शिक्षकों को ऐसा कोई लाभ या वरीयता दी जाती है, जिसकी अनुमति संबंधित नियमों या सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में नहीं है, तो याचिकाकर्ता उस कार्रवाई को अलग से चुनौती दे सकते हैं। इसी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।