वर्ष 1970 के बाद से पहली बार किसी भी राज्य में सत्ता में नहीं होंगे वामदल
वर्ष 1970 के बाद से पहली बार किसी भी राज्य में सत्ता में नहीं होंगे वामदल
नई दिल्ली, 4 मई । केरल विधानसभा चुनावों के रुझानों में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के पिछड़ने के बाद देश में 1970 के दशक के बाद पहली बार ऐसा होगा कि किसी भी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं होगी। इससे पहले साल 2011 में पश्चिम बंगाल और साल 2018 में त्रिपुरा में भी वाम दलों को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। केरल में पार्टी मुख्य विपक्षी दल बनी हुई है। हालांकि, बंगाल में साल 2011 में 62 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) साल 2021 आते-आते विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत पाई। वहीं, त्रिपुरा में साल 2018 में 16 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल बनी पार्टी साल 2023 के चुनाव में महज 11 सीटों पर सिमट गई।
केरल में मौजूदा रुझानों में कांग्रेस-नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) 69 सीटों पर जीत के साथ कुल 100 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि वामदलों की अगुवाई वाला एलडीएफ केवल 26 सीटों पर जीत सहित कुल 34 सीटों पर आगे है। राज्य में अब कांग्रेस सरकार बनना लगभग तय हो गया है। ऐसे में पिनराई विजयन की अगुवाई वाली एलडीएफ सरकार सत्ता से बाहर हो जाएगी और 1970 के दशक के बाद पहली बार ऐसा होगा कि देश के किसी भी राज्य में वामदल सत्ता में नहीं होगा।
आजादी के बाद वर्ष 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर संसद में सबसे बड़ी ताकत बनी थी। उस दौर में कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन विपक्ष में सबसे मजबूत आवाज वामदल ही थे। साल 1957 में केरल में वामपंथी दलों ने चुनाव जीतकर दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनाई। यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था, जिसने वामपंथ को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती दी।
इसके बाद पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा वामपंथी राजनीति के सबसे मजबूत गढ़ बने। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा ने साल 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक सत्ता संभाली। ज्योति बसु ने 23 साल तक मुख्यमंत्री पद संभाला और भारतीय राजनीति में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हुए। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सत्ता संभाली और साल 2011 तक वाम मोर्चा बंगाल की राजनीति पर हावी रहा। यह भारतीय राजनीति का सबसे लंबा शासनकाल था, जिसने वामपंथ को राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक ताकत बनाया।
त्रिपुरा में भी वामपंथी दलों की पकड़ मजबूत रही। साल 1993 में वाम मोर्चा ने यहां सत्ता हासिल की और साल 1998 से माणिक सरकार ने मुख्यमंत्री पद संभाला। उन्होंने लगातार 20 वर्षों तक राज्य की सत्ता पर पकड़ बनाए रखी। इस दौरान त्रिपुरा में वामपंथी राजनीति का दबदबा इतना मजबूत था कि विपक्ष लगभग अप्रभावी हो गया था।
प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए ज्योति बसु-
राष्ट्रीय राजनीति में भी वामपंथी दलों का अपना रुतबा था। ज्योति बसु भारतीय राजनीति के उन नेताओं में रहे जिन्हें तीन अलग-अलग मौकों पर प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन हर बार उनकी ही पार्टी ने उन्हें पीछे खींच लिया। पहला मौका साल 1990 में आया जब लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद वीपी सिंह सरकार संकट में थी और राजीव गांधी ने अपनी पसंद का प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की। राजीव ने ज्योति बसु को संदेश भिजवाया, लेकिन बसु ने साफ कहा कि यह निर्णय वह अकेले नहीं ले सकते, इसे पार्टी की पोलित ब्यूरो या सेंट्रल कमेटी ही तय करेगी। पार्टी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और अंततः चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। दूसरा मौका भी साल 1990 के दशक में आया, जब राजनीतिक अस्थिरता के बीच राजीव गांधी ने फिर से बसु का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन पार्टी ने उन्हें अनुमति नहीं दी। तीसरा और सबसे बड़ा अवसर साल 1996 में आया जब लोकसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला और संयुक्त मोर्चा सरकार बनाने की स्थिति बनी। उस समय वीपी सिंह ने खुद सुझाव दिया कि ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनें, हरकिशन सिंह सुरजीत ने भी उनका नाम आगे बढ़ाया और कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देने का संकेत दिया लेकिन माकपा की सेंट्रल कमेटी ने बहुमत न होने का तर्क देकर उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया। बाद में बसु ने इसे पार्टी की ऐतिहासिक भूल करार दिया और माना कि अगर वे प्रधानमंत्री बनते तो भारतीय राजनीति में वामपंथ को एक नया रूप मिलता।
इसके बाद साल 2004 में वाम दलों ने यूपीए सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभाई। उस समय लोकसभा में वाम दलों के कुल 59 सांसद थे। माकपा के 43, भाकपा के 10, क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (आरएसपी) और ऑल इंडिया फॉर्वर्ड ब्लॉक (एआईएफबी) के 6 सांसद। इस संख्या ने वाम दलों को केंद्र की राजनीति में किंगमेकर बना दिया था, लेकिन साल 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर समर्थन वापस लेने के बाद इनकी ताकत कमजोर होती चली गई। साल 2011 में जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने परिवर्तन के नारे के साथ वाम मोर्चे को सत्ता से बाहर कर दिया। यह वामपंथ के लिए सबसे बड़ा झटका था। इसके बाद साल 2018 में त्रिपुरा में भी भाजपा ने वाम दलों का गढ़ ढहा दिया। भाजपा ने 60 सदस्यीय विधानसभा में 36 सीटें जीतकर वामपंथ को सत्ता से बाहर कर दिया।
साल 2018 के बाद से ही केरल ही वामपंथ की आखिरी मजबूत जमीन बची थी। पिनराई विजयन की अगुवाई में एलडीएफ ने साल 2016 और साल 2021 में लगातार जीत दर्ज कर राज्य में सत्ता और वाम अस्तित्व दोनों बनाए रखे। साल 2021 के विधानसभा चुनावों में एलडीएफ की जीत के बाद ऐसा पहली बार हुआ था कि जब केरल में सरकार ने पांच साल बाद भी सत्ता में वापसी की। अब साल 2026 में मौजूदा चुनावी रुझान बता रहे हैं कि यह गढ़ भी हाथ से निकल रहा है।
वाम दलों का राष्ट्रीय राजनीति में रुतबा
देश की राजनीति की बात करें तो वामदलों का ग्राफ भी लगातार गिरता गया है। साल 1952 में भाकपा ने 16 सीटें जीतीं, साल 1957 में 27 सीटें, साल 1962 में 29 सीटें और साल 1967 में वाम दलों (भाकपा और माकपा) ने कुल 40 से अधिक सीटें हासिल कीं। साल 1980 और साल 1990 के दशक में लोकसभा में वाम दलों (भाकपा, माकपा, आरएसपी, एआईएफबी और अन्य सहयोगी दलों) की संयुक्त संख्या 40 से अधिक रही। इसके बाद साल 2004 में कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (सप्रंग) को समर्थन देकर सरकार बनाई। उस समय लोकसभा में वाम दलों के पास कुल 59 सीटें थीं। माकपा 43, भाकपा 10, आरएसपी और एआईएफबी जैसी सहयोगी पार्टियों को 6 सीटें मिलीं, लेकिन साल 2009 में यह संख्या घटकर 24 रह गई। साल 2014 में वाम दलों की कुल सीटें और कम हो गईं। साल 2019 में वाम दलों की कुल सीटें और घट गईं। साल 2024 में माकपा 4, भाकपा 2, भाकपा (माले) 2 और आरएसपी 1 के साथ कुल 9 सांसद ही बचे।
केरल आखिरी गढ़-
पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी यही कहानी रही। साल 1977 में वाम मोर्चा ने 231 सीटें जीतीं, साल 1982 में 238, साल 1987 में 251, साल 1991 में 245, साल 1996 में 227 और साल 2006 में 235 सीटों के साथ चरम पर रहा, लेकिन साल 2011 में यह संख्या घटकर 62 रह गई और सत्ता हाथ से निकल गई। साल 2021 में वामदल बंगाल विधानसभा में शून्य पर पहुंच गए और साल 2026 के रुझानों में केवल एक सीट पर बढ़त दिख रही है।
केरल विधानसभा में साल 1957 में भाकपा ने 60 सीटें जीतीं और पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार बनाई। साल 1980 में वाम मोर्चा/एलडीएफ ने 93 सीटें, साल 1987 में 78, साल 2006 में 98, साल 2011 में 68, साल 2016 में 91 और साल 2021 में 99 सीटों के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की, लेकिन साल 2026 के रुझानों में एलडीएफ केवल 34 सीटों पर आगे है।
त्रिपुरा में साल 1993 में वाम मोर्चा ने 44 सीटें जीतीं, साल 1998 और साल 2003 में 38-38, साल 2008 में 46 और साल 2013 में 50 सीटों के साथ चरम पर रहा, लेकिन साल 2018 में भाजपा ने गढ़ ढहा दिया और वामदल 16 सीटों पर सिमट गए। साल 2023 में यह संख्या घटकर 11 रह गई। पिछले 25 वर्षों में वामपंथी दलों का ग्राफ लगातार गिरता गया है। साल 1990 के दशक में जब ज्योति बसु और माणिक सरकार जैसे नेता अपने-अपने राज्यों में सत्ता संभाल रहे थे, तब वामपंथी राजनीति का दबदबा सबसे ऊंचाई पर था लेकिन साल 2009 के आम चुनावों के बाद से वामदलों का रुतबा और साख लगातार नीचे आती रही।