बीएड छात्रा को मातृत्व लाभ देने के मामले में सहानुभूति पूर्वक निर्णय लेने का विश्वविद्यालय को निर्देश
बीएड छात्रा को मातृत्व लाभ देने के मामले में सहानुभूति पूर्वक निर्णय लेने का विश्वविद्यालय को निर्देश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि छात्राओं के लिए मातृत्व अवकाश सम्बंधी नियम बनाना विश्वविद्यालयों का दायित्व है। प्रगति मिश्रा बीएड छात्रा की याचिका निस्तारित करते हुए न्यायमूर्ति विवेक सरन की एकलपीठ ने कहा, प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ राज्य विश्वविद्यालय याची के प्रार्थना पत्र पर विधि अनुसार सहानुभूतिपूर्वक निर्णय ले।
कौशाम्बी की याची ने सत्र 2018-20 में बीएड पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। पहले दो सेमेस्टर में वह उत्तीर्ण हो गई। लेकिन तृतीय सेमेस्टर के विषय ‘एजुकेशन मेजरमेंट, इवैल्यूएशन एंड स्टैटिस्टिक्स’ में असफल रही। चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन तृतीय सेमेस्टर के बैक पेपर में असफलता के कारण उसे डिग्री नहीं दी गई। याची ने कोर्ट को बताया कि वह वर्ष 2020 में गर्भवती थी और पांच दिसम्बर 2020 को पुत्र को जन्म दिया। गर्भावस्था और प्रसवोत्तर अवधि के कारण वह बैक पेपर परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सकी। विश्वविद्यालय को ई-मेल भेज परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी, लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया गया।
अदालत ने सौम्या तिवारी मामले में दिए गए निर्देशों के अनुपालन में राज्य विश्वविद्यालयों को गर्भवती छात्राओं के लिए मातृत्व अवकाश और समर्थन प्रणाली की व्यवस्था करने का निर्देश दिया।