पत्नी हत्या के आरोपित को मिला संदेह का लाभ, अपराध से बरी

--सत्र अदालत मथुरा ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा --अभियोजन अपराध साबित करने में नाकाम, पुलिस के समक्ष कबूलनामे पर सजा अनुचित करार

पत्नी हत्या के आरोपित को मिला संदेह का लाभ, अपराध से बरी

प्रयागराज, 12 फरवरी । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चार दशक पुराने एक जघन्य हत्याकांड के आरोपित पति को दोषमुक्त कर दिया है। सत्र अदालत मथुरा ने वर्ष 1984 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। जिसे कोर्ट ने कानून की दृष्टि में दोषपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता तथा न्यायमूर्ति देवेन्द्र सिंह-प्रथम की खंडपीठ ने कहा कि पुलिस के समक्ष किया गया इकबालिया बयान कानूनी रूप से साक्ष्य के तौर पर मान्य नहीं है और केवल इसी आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला 1983 का है। मथुरा जिले के राया थाने में राधा चरण शर्मा नामक व्यक्ति ने खुद थाने पहुंचकर अपनी पत्नी प्रमिला की हत्या की सूचना दी थी। उस समय दर्ज कराई गई रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित ने स्वीकार किया था कि 2 फरवरी 1983 की रात पत्नी से हुए विवाद के बाद उसने गुस्से में आकर फरसे से उसकी गर्दन काट दी थी। मथुरा की निचली अदालत ने आरोपित के इसी लिखित कबूलनामे और परिस्थितियों को आधार मानते हुए 19 जनवरी 1984 को उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी। जिसके खिलाफ अपील दाखिल की गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस के सामने दी गई स्वीकारोक्ति को सबूत मानकर गंभीर कानूनी चूक की। क्योंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत ऐसी स्वीकारोक्ति अदालत में मान्य नहीं है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि घटना के वक्त आरोपित वास्तव में घर के भीतर मौजूद था। साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उस पर सबूत का भार तब तक नहीं डाला जा सकता, जब तक अभियोजन अपने बुनियादी तथ्यों को ठोस तरीके से पेश न कर दे।

मामले की संदेहास्पद कड़ियों का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि हत्या में इस्तेमाल कथित फरसे की बरामदगी भी सवालों के घेरे में थी। बरामदगी के गवाह मुकर चुके थे और मेडिकल रिपोर्ट ने भी अभियोजन के दावों की पुष्टि नहीं की। डॉक्टरी परीक्षण के अनुसार, जो फरसा पुलिस ने बरामद किया था, वह इतना धारदार नहीं था कि उससे मृतका के शरीर पर मौजूद गहरे घाव किए जा सकें। इसके अलावा, घटना के समय घर में मौजूद परिवार के अन्य सदस्यों को गवाह के तौर पर पेश न करना मामले को संदिग्ध बनाता है।

कोर्ट ने कहा कि आरोपित के विरुद्ध परिस्थितियों की कड़ी पूरी तरह से टूटी हुई है और संदेह का लाभ आरोपित को मिलना अनिवार्य है। अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राधा चरण शर्मा को तत्काल रिहा करने का आदेश जारी कर दिया।