30 करोड़ के बिजली टेंडर घोटाले में हाईकोर्ट सख्त, अधिकारियों और ठेकेदारों की सभी याचिकाएं खारिज
आगरा के फतेहाबाद विद्युत वितरण खंड में 30.44 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—एफआईआर में संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया खुलासा
प्रयागराज, 06 नवंबर
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा के फतेहाबाद विद्युत वितरण खंड में करीब 30.44 करोड़ रुपये के कथित टेंडर घोटाले के मामले में दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर के प्रथम दृष्टया अवलोकन से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है। आरोपों की सत्यता और आरोपियों के बचाव का परीक्षण इस स्तर पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है।
न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह आदेश नीरज पाठक, राजू, रविकांत मिश्रा समेत 17 याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया। सभी याचिकाएं एक ही मुकदमे से संबंधित थीं।
मामला दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के फतेहाबाद विद्युत वितरण खंड में वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के दौरान हुए बिजली कार्यों के टेंडर में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। तीन सदस्यीय विभागीय जांच समिति ने 31 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में 50 टेंडरों में बोलीदाताओं के आईपी एड्रेस समान पाए जाने, 28 टेंडरों में निर्धारित फीस और धरोहर राशि जमा किए बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाने, सक्षम समिति की मंजूरी के बिना ठेके देने और टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे। जांच रिपोर्ट में निगम को करीब 30 करोड़ 44 लाख रुपये की वित्तीय क्षति होने की बात कही गई थी।
आरोप यह भी था कि कुछ निरस्त टेंडरों के बावजूद अनुबंध किए गए, बिना टेंडर प्रकाशित किए कार्य आवंटित किए गए और वित्तीय बोली खोले बिना गैर प्रतिभागियों तथा एल-2 बोलीदाताओं के पक्ष में ईआरपी सिस्टम से खरीद आदेश जारी किए गए। मामले में 10 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज की गई थी।
याचियों की ओर से दलील दी गई कि कई आरोपी कर्मचारी लिपिकीय पदों पर कार्यरत थे और उनके पास टेंडर स्वीकृत करने या वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार नहीं था। विभागीय जांच एकपक्षीय थी और जांच समिति के अध्यक्ष पर भी हितों के टकराव का आरोप लगाया गया। ठेकेदारों की ओर से कहा गया कि समान आईपी एड्रेस का इस्तेमाल साइबर कैफे के कारण हो सकता है और कथित वित्तीय अंतर केवल तकनीकी या लिपिकीय त्रुटि है।
राज्य सरकार की ओर से इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा गया कि एफआईआर में आरोपियों की भूमिका, टेंडर संख्या, तारीख और रकम का स्पष्ट उल्लेख है। आरोपों की जांच आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच रिपोर्ट आपराधिक मुकदमे में ठोस साक्ष्य नहीं होती, लेकिन एफआईआर दर्ज करने का आधार जरूर बन सकती है। समान आईपी एड्रेस का इस्तेमाल अन्य आरोपों के साथ मिलकर गंभीर संदेह पैदा करता है, जिसकी जांच जरूरी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि किसी कर्मचारी को वित्तीय अधिकार नहीं थे। ईआरपी आईडी के इस्तेमाल और खरीद आदेश जारी करने में उसकी भूमिका जांच का विषय है। इसी आधार पर कोर्ट ने सभी संबद्ध याचिकाएं खारिज कर दीं।