कोडीन कफ सिरप मामले में आरोपित अंकुल मौर्या की रिमांड मंजूर, एनडीपीएस एक्ट की धाराएं बढ़ीं
कोडीन कफ सिरप मामले में आरोपित अंकुल मौर्या की रिमांड मंजूर, एनडीपीएस एक्ट की धाराएं बढ़ीं
जौनपुर, 07 फरवरी । कोडीन युक्त कफ सिरप के बहुचर्चित मामले में आरोपित अंकुल कुमार मौर्या की रिमांड शनिवार को अदालत ने स्वीकार कर ली है। अंकुल मौर्या निवासी मुरादगंज, लाइन बाजार, पूर्व में एक मारपीट के मामले में जेल में निरुद्ध था। इसी बीच उसे कोडीन कफ सिरप मामले में अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय की अदालत में पेश किया गया, जहां विवेचना के दौरान एनडीपीएस एक्ट की अतिरिक्त धाराएं बढ़ाई गईं।
आरोपित की ओर से अधिवक्ता प्रवीण सोलंकी ने अदालत में तर्क दिया कि अंकुल कुमार मौर्या पहले से ही एक अन्य प्रकरण में जेल में बंद था और कोडीन कफ सिरप मामले में भी उसे वांछित दिखाया गया है। ऐसे में इस प्रकरण में भी उसकी रिमांड स्वीकार कर उसे न्यायिक अभिरक्षा में लिया जाए। अदालत ने आरोपित पर धोखाधड़ी, जालसाजी तथा एनडीपीएस एक्ट के तहत रिमांड मंजूर करते हुए उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया। मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 फरवरी की तिथि नियत की गई है। कोतवाली थाने में औषधि निरीक्षक रजत कुमार द्वारा 21 नवंबर 2025 को इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। एफआईआर में भोला प्रसाद, शुभम जायसवाल सहित कुल 14 आरोपियों के नाम शामिल हैं। आरोप है कि जनपद की 12 फर्मों ने भोला जायसवाल की फर्म ‘मेसर्स शैली ट्रेडर्स’ के माध्यम से लगभग 42 करोड़ रुपये मूल्य के कोडीन युक्त कफ सिरप का कारोबार किया। जांच में सामने आया कि सिरप की खेप वास्तविक रूप से जनपद में आई ही नहीं, जबकि कागजों में उसकी बिक्री दर्शा दी गई। आरोप है कि षड्यंत्र के तहत भारी मात्रा में कोडीन युक्त कफ सिरप का अवैध लाभ कमाने के उद्देश्य से गैर-चिकित्सकीय नशे के रूप में विक्रय दिखाया गया।वहीं, बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता प्रवीण सिंह सोलंकी ने दलील दी कि सभी आरोपियों के पास अपने-अपने मेडिकल स्टोर के वैध लाइसेंस हैं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की अधिसूचना दिनांक 14 नवंबर 1985 के क्लॉज-35 के अनुसार न्यू फैंसीडिल कफ सिरप नारकोटिक ड्रग की श्रेणी में नहीं आता। साथ ही, इसे बनाने वाली कंपनी एबाट इंडिया लिमिटेड भारत सरकार द्वारा अधिकृत है। ड्रग रूल्स 1945 के रूल-97 के तहत यह कफ सिरप आरएक्स श्रेणी में आता है। इसके अलावा जिन दस्तावेजों को फर्जी बताया जा रहा है, उनके सापेक्ष जीएसटी विभाग में कर का भुगतान किया गया है, जिससे वे कूटरचित दस्तावेजों की श्रेणी में नहीं आते। फिलहाल मामले की जांच और अदालती प्रक्रिया जारी है।