स्नातक-शिक्षक चुनाव के खिलाफ PIL खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताई वजह
पुरानी मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने को दी गई थी चुनौती, कोर्ट ने नाम जोड़ने की प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप माना और अनुच्छेद 329 का भी उल्लेख किया
प्रयागराज, 08 अक्टूबर .। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव की चुनौती में दाखिल जनहित याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने यह आदेश दिया।
इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के निवासी अक्षय उपाध्याय ने याचिका दाखिल कर 29 सितंबर 2026 की चुनाव अधिसूचना को रद्द करने की मांग की थी। उनका कहना था कि चुनाव 30 सितंबर 2025 की अधिसूचना के आधार पर बनी पुरानी मतदाता सूची पर कराए जा रहे हैं। याचिका में 5 स्नातक और 6 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए नई मतदाता सूची बनवाने की भी मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि 2025 की सूची में योग्यता तिथि 1 नवंबर 2025 थी, जबकि चुनाव 23 अक्टूबर 2026 को होना है। इससे 2023 में स्नातक करने वाले युवा मतदाता सूची से बाहर रह गए हैं। आरोप लगाया कि 26 से 29 सितंबर 2026 के बीच मतदाता सूची तैयार करने की कवायद हुई और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 31(4) के तहत अधिसूचना प्रकाशित नहीं की गई।
निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका को आधारहीन बताया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया 21 नवंबर 2025 की अधिसूचना से शुरू हुई थी और अंतिम प्रकाशन 6 जनवरी 2026 को हो चुका था। हाल की कवायद जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(3) के तहत नाम जोड़ने की प्रक्रिया है, जिसमें अखबारों में अधिसूचना छपवाने का कोई प्रावधान नहीं है। आयोग ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता की ऐसी ही एक याचिका 15 अक्टूबर 2025 को पहले ही खारिज हो चुकी है। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत चुनाव प्रक्रिया में दखल पर रोक का हवाला दिया गया।
खंडपीठ ने कहा कि मतदाता सूची की तैयारी, संशोधन और नाम जोड़ने से जुड़े प्रावधान 1950 अधिनियम की धाराओं 21, 22 और 23 में हैं। धारा 23(3) के अनुसार संबंधित क्षेत्र में नामांकन की अंतिम तिथि तक सूची में नाम जोड़े या संशोधित किए जा सकते हैं। इसलिए 26 से 29 सितंबर 2026 के बीच हुई कवायद में कोई खामी नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि याचिका धारा 21 और 23 के अंतर को न समझने के कारण उपजी "गलत आशंका" पर आधारित है। नियम 31 का संबंध धारा 21 के तहत सूची तैयार करने से है और यह धारा 23 पर लागू नहीं होता, इसलिए इसके उल्लंघन का तर्क निराधार है।
चुनाव अधिसूचना को चुनौती पर पीठ ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसलिए अनुच्छेद 329 की रोक भी लागू होती है और अधिसूचना को चुनौती नहीं दी जा सकती। इन आधारों पर कोर्ट ने याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।