राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ कितनी दूर जाएगी? युवाओं के मुद्दों पर ठोस समाधान की चुनौती
: राजेश सिरोठिया के विचार लेख में शिक्षा, रोजगार, भर्ती प्रक्रिया और आर्थिक अवसरों को लेकर कांग्रेस की नीति पर सवाल; कोटा से इंदौर तक हुए कार्यक्रमों के असर पर चर्चा।
देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के शीर्ष नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों जातिगत जनगणना के मुद्दे से आगे बढ़कर देश की युवा तरुणाई तक पहुंच बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। सवाल है—छात्रों और युवाओं के बीच उठाई जा रही उनकी यह ‘गूंज’ आखिर कितनी दूर तक जाएगी?
राहुल गांधी लंबे समय से जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर उठाते रहे हैं। लेकिन बिहार के चुनावी अनुभव ने इस रणनीति की राजनीतिक उपयोगिता पर सवाल खड़े किए। अब उन्होंने छात्रों और युवाओं की ओर रुख किया है। कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे के बाद 19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ का पांचवां कार्यक्रम हुआ।
शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और ‘सिस्टम’ राहुल गांधी के नए अभियान के प्रमुख विषय हैं। इन सवालों से असहमति की गुंजाइश कम है। देश का युवा सचमुच इन समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन यहीं राहुल गांधी के सामने असली सवाल खड़ा होता है—समस्या सबको दिखाई दे रही है, समाधान क्या है?
जिस ‘सिस्टम’ पर राहुल गांधी सवाल उठा रहे हैं, वह एक दिन में बना हुआ ढांचा नहीं है। कांग्रेस सहित विभिन्न दलों की सरकारें दशकों तक इसे चलाती रही हैं। इसलिए अगर राहुल गांधी इसे बदलने की बात करते हैं तो देश यह जानना चाहेगा कि वे सत्ता में आने पर इसे बदलेंगे कैसे?
करोड़ों युवाओं को केवल सरकारी नौकरियां देना संभव नहीं है। रोजगार का रास्ता सरकारी क्षेत्र के साथ निजी उद्योग, छोटे-मझोले उद्यम, स्टार्टअप, स्वरोजगार, कृषि और नई अर्थव्यवस्था से होकर भी गुजरता है। ऐसे में राहुल गांधी की आर्थिक नीति और रोजगार का वैकल्पिक मॉडल क्या होगा—यह सवाल उनके भाषणों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
यहीं राहुल गांधी की राजनीति की एक बड़ी कमजोरी सामने आती है। वे कई बार भाजपा सरकारों की वास्तविक कमजोरियों को पकड़ने के बजाय नरेन्द्र मोदी सरीखी विशाल राजनीतिक मछली पकड़ने की कोशिश करते हैं, जो उनके हाथ से बार-बार फिसल जाती है।
सत्ता की अकुलाहट में कांग्रेस ने अपने कई प्रभावी राजनीतिक अस्त्रों की धार भी कुंद की है। मोदी सरकार की नीतियों, प्रशासनिक विफलताओं, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्थागत पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर लगातार और ठोस अभियान चलाने के बजाय बहस कई बार व्यक्ति-केंद्रित हो जाती है।
दूसरी ओर भाजपा, कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप वाले राजनीतिक नैरेटिव पर घेरती है। कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि इस आरोप का जवाब देते हुए उसे अपनी अल्पसंख्यक नीति और व्यापक सामाजिक न्याय की नीति को अधिक स्पष्ट करना होगा। कांग्रेस की पुरानी राजनीति को उसके आलोचक एक ऐसे सामाजिक समीकरण से जोड़ते रहे हैं जिसमें मुस्लिम मतदाताओं को उसका अपेक्षाकृत स्थिर आधार माना गया। यही धारणा अब कांग्रेस के लिए राजनीतिक बोझ भी बनती दिखाई देती है।
मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन भी कोई स्थायी या एकमुश्त राजनीतिक संपत्ति नहीं है। अलग-अलग राज्यों में जब उन्हें प्रभावी क्षेत्रीय विकल्प दिखाई देता है, तो उनका समर्थन उन दलों की ओर जाता रहा है। बिहार के चुनावी अध्ययन में भी मुस्लिम और यादव मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के महागठबंधन की ओर जाने का उल्लेख मिलता है, जबकि दलित मतदाताओं के व्यवहार में चरण और क्षेत्र के अनुसार बदलाव दिखाई दिया।
यही बात कांग्रेस के व्यापक सामाजिक आधार पर भी लागू होती है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और सवर्ण मतदाताओं का समर्थन भी किसी एक दल के लिए स्थायी नहीं है। चुनाव-दर-चुनाव समीकरण बदलते रहे हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह इन समुदायों को केवल चुनावी गणित का हिस्सा मानने के बजाय उनके लिए शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अवसरों के ठोस कार्यक्रम सामने रखे।
राहुल गांधी के सामने चुनौती केवल भीड़ जुटाने की नहीं है। युवा एकरूप मतदाता नहीं है। किसी के लिए सरकारी नौकरी महत्वपूर्ण है, किसी के लिए निजी रोजगार, किसी के लिए उद्यमिता और किसी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा। इसलिए छात्रों की भावनाओं को राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए भावनात्मक भाषण से अधिक जरूरी है—ठोस कार्यक्रम।
यदि राहुल गांधी ‘सिस्टम’ बदलने की बात करते हैं तो उन्हें बताना होगा कि शिक्षा व्यवस्था कैसे बदलेगी, भर्ती प्रक्रिया कैसे सुधरेगी, निजी क्षेत्र में रोजगार कैसे बढ़ेगा, युवाओं को कौशल और पूंजी कैसे मिलेगी और देश की अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका क्या होगी।
यही ‘छात्रों की गूंज’ की असली परीक्षा है।
कोटा से इंदौर तक उठी आवाज यदि केवल सभाओं और सोशल मीडिया तक सीमित रहती है तो उसका प्रभाव सीमित हो सकता है। लेकिन यदि कांग्रेस इसे युवाओं के लिए स्पष्ट नीति, रोजगार के कार्यक्रम और शासन के वैकल्पिक मॉडल में बदल पाती है, तो यह उसके राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे सकती है।
राहुल गांधी को यह भी समझना होगा कि नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के लिए केवल मोदी-विरोध पर्याप्त नहीं है। उन्हें देश के सामने यह भी रखना होगा कि मोदी के बाद भारत कैसा होगा और उस भारत को बनाने की उनकी योजना क्या है।
‘छात्रों की गूंज’ कितनी दूर तक जाएगी, इसका फैसला किसी मंच पर नहीं होगा। फैसला तब होगा, जब देश का युवा यह तय करेगा कि उसे केवल अपनी समस्या की आवाज चाहिए—या उस समस्या का समाधान भी।