ड्यूटी के दौरान पुलिस कार्रवाई पर FIR के आदेश में बरतें सावधानी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किए दिशा-निर्देश

महराजगंज की विशेष अदालत का आदेश रद्द, पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की कार्यवाही समाप्त; यूपी के न्यायिक अधिकारियों को पुलिस का पक्ष और वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट देखने के निर्देश

ड्यूटी के दौरान पुलिस कार्रवाई पर FIR के आदेश में बरतें सावधानी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किए दिशा-निर्देश

प्रयागराज, 09 अक्टूबर  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महराजगंज की विशेष अदालत (एससी/एसटी एक्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक सब-इंस्पेक्टर, एक कांस्टेबल और करीब 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति संतोष राय ने राकेश कुमार यादव की आपराधिक अपील पर यह आदेश दिया।

दर्जनों पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एस सी/ एस टी एक्ट सहित अन्य अपराधों में दर्ज केस कार्यवाही रद्द

थाना घुघुली (महराजगंज) क्षेत्र के बसंतपुर गांव की दो महिलाओं, शीला और अंजू, ने बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत अर्जी दी थी। उनका आरोप था कि 6-7 जून 2026 की रात करीब 1 से 2 बजे सब-इंस्पेक्टर राकेश कुमार यादव, कांस्टेबल अमित कुमार और लगभग 20 पुलिसकर्मी बिना महिला पुलिस और बिना तलाशी वारंट के उनके घर में घुस आए। आरोप है कि उन्होंने अभद्रता की, शौचालय जाने से रोका और जातिसूचक टिप्पणियां कीं। महिलाओं ने खुद को अनुसूचित जाति (चमार) का बताया। उनका कहना था कि एसपी महराजगंज को 12 जून को शिकायत देने पर भी कार्रवाई नहीं हुई।

विशेष न्यायाधीश ने 11 अगस्त 2026 को अर्जी स्वीकार कर थानाध्यक्ष को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। इसमें बीएनएस की धाराओं 74, 351, 333 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर ), 3(1)(एस) का उल्लेख था।

अपीलकर्ता पुलिसकर्मियों का कहना था कि वे उसी दिन हुए झगड़े के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने की ड्यूटी पर थे। उसी घटना को लेकर थाने में दो क्रॉस केस पहले ही दर्ज हो चुके थे, जिनमें आरोप-पत्र भी दाखिल हो चुका है। उनके मुताबिक नई शिकायत उसी का "जवाबी हमला" है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना निजी आवास के भीतर की बताई गई है, इसलिए एससी/एसटी एक्ट के लिए जरूरी "सार्वजनिक दृष्टि" की शर्त पूरी नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान सिर्फ एसपी के पास जाने का उपाय देता है। जांच का न्यायिक निर्देश देने की शक्ति धारा 175(3) बीएनएसएस (पूर्व सीआरपीसी धारा 156(3)) से आती है। केवल अर्जी का नाम धारा 173(4) रख देने से विशेष अदालत को एफआईआर का आदेश देने का अधिकार नहीं मिल जाता।



कोर्ट ने कहा मजिस्ट्रेट को शपथपत्र सहित अर्जी पर विचार करना, आवश्यक जांच करना और पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनना होता है। कोर्ट ने कहा कि विशेष न्यायाधीश ने न तो यह दर्ज किया कि जांच जरूरी क्यों नहीं समझी गई और न ही पुलिस की रिपोर्ट पर विचार किया, जबकि वह रिपोर्ट अदालत ने खुद मंगाई थी। कोर्ट ने कहा लोक सेवक के खिलाफ शिकायत में, यदि कार्य आधिकारिक ड्यूटी से जुड़ा प्रतीत हो, तो वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट मंगाना और संबंधित लोक सेवक का पक्ष सुनना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि उसी दिन परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी और जीडी एंट्री से पुलिस की मौजूदगी और ड्यूटी के बीच प्रथम दृष्टया संबंध दिखता है।

शिकायतकर्ता अंजू क्रॉस केस की सूचनाकर्ता की पत्नी और दूसरे क्रॉस केस में आरोपी की पत्नी है, जबकि आरोपी सब-इंस्पेक्टर दोनों मामलों का विवेचक था। कोर्ट ने कहा कि इससे शिकायत के पीछे उद्देश्य या हित का अनुमान लगाया जा सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के सही या गलत होने पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। आदेश को "गंभीर चिंता का विषय" बताते हुए कोर्ट ने कहा कि इसमें आपराधिक प्रक्रिया के बुनियादी सिद्धांतों की समझ का अभाव झलकता है।

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 11 अगस्त 2026 का आदेश और उससे उपजी सभी कार्यवाही रद्द कर दी। साथ ही उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों के लिए ये निर्देश जारी किए:

कोर्ट ने कहा सभी न्यायिक अधिकारियों के लिए धारा 173(4)/175(3) पर आदेश देने से पहले संबंधित पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या पक्ष पर विचार करना अनिवार्य है। अदालत यह जांचेगी कि आवेदक ने धारा 173 की वैधानिक प्रक्रिया अपनाई है या नहीं।

धारा 175(4) स्वतंत्र प्रावधान नहीं है और धारा 175(3) की सुरक्षाओं को दरकिनार नहीं कर सकती। दोनों को साथ पढ़ा जाएगा।जहां कार्य आधिकारिक ड्यूटी के दौरान हुआ प्रतीत हो, वहां आदेश में स्पष्ट निष्कर्ष होना चाहिए कि कृत्य का ड्यूटी से उचित संबंध है या नहीं।

जहां आरोपी पुलिसकर्मी पहले शिकायतकर्ता या उसके परिवार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर चुके हों, गिरफ्तारी कर चुके हों या क्रॉस केस की विवेचना कर रहे हों, वहां "अतिरिक्त न्यायिक सावधानी" बरती जाए। कोर्ट ने कहा कि पूर्व पुलिस कार्रवाई अपने आप में न शिकायत को झूठा साबित करती है, न सच।धारा 175(3) की जांच "मिनी ट्रायल" नहीं होगी, बल्कि सिर्फ उतनी होगी जितनी न्यायिक विवेक के लिए जरूरी हो। हर आदेश "स्पष्ट और तर्कसंगत" होना चाहिए।वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट उचित समय में न आए तो अदालत अनिश्चित प्रतीक्षा किए बिना आगे बढ़ सकती है।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश को निर्देशों के अनुपालन की निगरानी मासिक बैठकों में करने को कहा गया है। कोर्ट ने कहा कि फैसले की प्रति रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से सभी न्यायिक अधिकारियों और जेटीआरआई (लखनऊ) को भेजी जाएगी। साथ ही प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों, एसएसपी/एसपी और पुलिस आयुक्तों को भी जानकारी व अनुपालन के लिए प्रतिभेजी जाएगी।