संभल हिंसा मामला : यूपी सरकार व एएसपी ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी
संभल हिंसा मामला : यूपी सरकार व एएसपी ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी
प्रयागराज, 09 फरवरी । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार और संभल के अपर पुलिस अधीक्षक अनुज चौधरी द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। जिसमें संभल हिंसा मामले को लेकर पुलिस कर्मियों के खिलाफ वहां के सीजेएम ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई जारी रहेगी।
इन याचिकाओं में संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा एएसपी चौधरी एवं अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश को विभिन्न आधारों पर चुनौती दी गई। यह आदेश नवम्बर 2024 की संभल हिंसा से सम्बंधित है। एफआईआर का आदेश सीजेएम विभांशु सुधीर द्वारा यामीन नामक व्यक्ति की अर्जी पर पारित किया गया है। यामीन संभल हिंसा में घायल युवक का पिता है और उसने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उसके बेटे को जान से मारने की नीयत से गोली चलाई थी।
इस आदेश के ठीक एक सप्ताह बाद सीजेएम विभांशु सुधीर का तबादला हाईकोर्ट द्वारा सुल्तानपुर कर दिया गया था। राज्य सरकार और पुलिस अधिकारी की ओर से एडिशनल एडवोकेट जरनल मनीष गोयल ने दलीलें रखते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की सीमाओं का उल्लंघन किया है और कानून में निहित अनिवार्य सुरक्षा प्रावधानों की अनदेखी की है। अपर महाधिवक्ता ने कहा कि सीजेएम ने बीएनएसएस की धारा 175 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश तो पारित किया, लेकिन धारा 175(4) में निर्धारित कठोर और अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया जो अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान कार्य करने वाले लोक सेवकों को निरर्थक और दुर्भावनापूर्ण आपराधिक कार्यवाहियों से संरक्षण प्रदान करती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 175(4) के तहत किसी लोक सेवक के विरुद्ध जांच का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को दो चरणों की प्रक्रिया अपनानी होती है-(क) किसी उच्च अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करना। (ख) उस घटना के संबंध में लोक सेवक द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण और परिस्थितियों पर विचार करना। कहा गया कि इस मामले में उप-धारा (4) के खंड (क) का तो पालन किया गया, लेकिन खंड (ख) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। पुलिस अधिकारियों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों पर कोई विचार नहीं किया गया। खंड (ख) वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है।
उन्होंने यह भी कहा कि यद्यपि सीजेएम ने सीनियर अधिकारियों से रिपोर्ट मंगवाई थी और वह रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत भी की गई, लेकिन आदेश में उस रिपोर्ट का कहीं कोई उल्लेख तक नहीं है। राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता द्वारा सीजेएम के समक्ष दायर आवेदन में यह तक नहीं बताया गया कि उसने पहले सम्बंधित थाने में शिकायत दर्ज कराई या नहीं, जबकि यह कानून के तहत एक आवश्यक शर्त है।
कहा गया कि सीजेएम ने न केवल अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया बल्कि पुलिस रिपोर्ट को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि घटना के सम्बंध में पहले से एक मामला दर्ज है और उसकी जांच चल रही है। कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई जारी रहेगी।