बीएचयू के डॉ. बाला लखेन्द्र को 'आईपीआर बेस्ट रिसर्चर' सम्मान से नवाजा गया: बौद्धिक संपदा अधिकार क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान की सराहना
बीएचयू के डॉ. बाला लखेन्द्र को 'आईपीआर बेस्ट रिसर्चर' सम्मान से नवाजा गया: बौद्धिक संपदा अधिकार क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान की सराहना
वाराणसी, 16 जुलाई काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पत्रकारिता एवं जन-संप्रेषण विभाग के वरिष्ठ उपाचार्य डॉ. बाला लखेन्द्र को बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights - IPR) शोध और जागरूकता के क्षेत्र में उनके असाधारण और उत्कृष्ट कार्यों के लिए प्रतिष्ठित 'आईपीआर बेस्ट रिसर्चर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह महत्वपूर्ण सम्मान उन्हें मुंबई के भव्य ताज पैलेस में आयोजित 'आईपीआर इंटरनेशनल कॉन्क्लेव' के दौरान प्रदान किया गया, जो बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैश्विक मंच है।
यह गौरवपूर्ण पुरस्कार डॉ. लखेन्द्र के दशकों के अथक परिश्रम और बौद्धिक संपदा के महत्व को जन-जन तक पहुँचाने की उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। पुरस्कार वितरण समारोह में कई गणमान्य हस्तियाँ उपस्थित थीं, जिनमें प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका 'कम्युनिकेशन टुडे' के प्रधान संपादक प्रो. संजीव भागवत और वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन (WIPO) के इंडिया हेड डॉ. रमेश चंद्र पंडा विशेष रूप से शामिल रहे। इनकी उपस्थिति ने इस समारोह और डॉ. लखेन्द्र के योगदान की महत्ता को और बढ़ा दिया।
सम्मेलन के दौरान, डॉ. लखेन्द्र ने "आईपीआर के वैश्विक फलक पर भारत" (India on the Global Canvas of IPR) विषय पर एक सारगर्भित बीज वक्तव्य (Keynote Address) प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में वैश्विक परिदृश्य में भारत की बौद्धिक संपदा स्थिति, चुनौतियों और अवसरों पर प्रकाश डाला। उनके गहन विश्लेषण और दूरगामी विचारों को उपस्थित विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं द्वारा अत्यधिक सराहा गया।
बुधवार को इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हर्ष और गर्व का माहौल दिखा। बीएचयू कला संकाय की प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने डॉ. बाला लखेन्द्र को हार्दिक बधाई दी। इसके अतिरिक्त, पत्रकारिता विभाग के उनके साथी शिक्षकों और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने भी उन्हें शुभकामनाएं व्यक्त कीं और उनके इस सम्मान को विश्वविद्यालय के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया।
गौरतलब है कि डॉ. बाला लखेन्द्र बौद्धिक संपदा अधिकार के प्रचार-प्रसार और जागरूकता कार्यक्रमों में लगातार सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। वे विभिन्न कार्यशालाओं, संगोष्ठियों और अकादमिक पहलों के माध्यम से छात्रों, शोधकर्ताओं और आम जनता के बीच आईपीआर के महत्व को स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उनका यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान को मान्यता देता है, बल्कि अकादमिक जगत में बौद्धिक संपदा अधिकार के बढ़ते महत्व को भी रेखांकित करता है।