प्रयागराज: प्रधानाचार्य के निलंबन पर हाईकोर्ट की रोक, ‘सुनवाई जरूरी या नहीं’ का फैसला अब बड़ी बेंच करेगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्रुखाबाद के कायमगंज स्थित कन्या विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य के निलंबन और डीआईओएस की मंजूरी के आदेश अगले आदेश तक स्थगित कर दिए।

प्रयागराज: प्रधानाचार्य के निलंबन पर हाईकोर्ट की रोक, ‘सुनवाई जरूरी या नहीं’ का फैसला अब बड़ी बेंच करेगी

प्रयागराज, 05 अक्टूबर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जनपद फर्रुखाबाद के कायमगंज स्थित कन्या विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ. विश्वमोहिनी पांडेय के निलंबन और उस पर जिला विद्यालय निरीक्षक की मंजूरी आदेशों को फिलहाल स्थगित कर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने यह आदेश देते हुए मामला बड़ी पीठ को भेजने के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया। मामले की खंडपीठ सुनवाई करेगी।

याचिकाकर्ता डॉ. पांडेय ने कॉलेज प्रबंधक के 1 जुलाई 2026 के निलंबन आदेश और डीआईओएस के 4 अगस्त 2026 के अनुमोदन आदेश को चुनौती दी है ।उनका कहना है कि निलंबन का आधार बनी जांच रिपोर्ट उन्हें कभी नहीं दी गई। अनुमोदन की सुनवाई में प्रबंधक का पक्ष उनकी गैरमौजूदगी में सुना गया और उन्हें जवाब का मौका नहीं मिला। याचिका के अनुसार, एक छात्रा के पिता, जो किसान यूनियन के कार्यकर्ता हैं, लगातार शिकायतें करते रहे। 2025 में तीन सदस्यीय समिति की जांच (रिपोर्ट 5 दिसंबर 2025) में आरोप निराधार पाए गए थे। इसके बाद दोबारा बनी समिति की रिपोर्ट के आधार पर निलंबन हुआ। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि धारा 16-जी(7) के तहत मंजूरी देते समय डीआईओएस को शिक्षक और प्रबंधन दोनों को सुनवाई का मौका देना और तर्कसंगत आदेश पारित करना चाहिए। प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कहा कि निलंबन दंड नहीं है और अधिनियम या विनियमों में मंजूरी के चरण पर सुनवाई का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने कहा कि डीआईओएस को सिर्फ प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज करनी होती है कि आरोपों में बल है या नहीं, और वह आरोपों के गुण-दोष में नहीं जा सकता। साथ ही उसे संक्षिप्त कारण वाला आदेश देना जरूरी है। लेकिन सुनवाई के सवाल पर हाईकोर्ट की दो खंडपीठों के फैसलों में मतभिन्नता है। एक पक्ष में सुनवाई जरूरी बताई गई है, दूसरे में नहीं।

कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के लिए किसी खंडपीठ से असहमति जताना उचित नहीं होगा, इसलिए मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए। धारा 16-जी(6) व (7) और विनियम 39 के तहत निलंबन की मंजूरी या नामंजूरी के चरण पर क्या प्रबंधन, शिक्षक या प्रधानाचार्य को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए? कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया पूरी कार्यवाही जिला प्रशासन की जांच से उपजी लगती है, जबकि कार्यवाही शुरू करना शिक्षा अधिकारियों का क्षेत्राधिकार है। इसी आधार पर दोनों आदेश अगले आदेश तक स्थगित रहेंगे।