वेश्यालय में रुपये देने वाले ग्राहक के खिलाफ नहीं चलाया जा सकता अनैतिक व्यापार का मुकदमा : हाईकोर्ट
वेश्यालय में रुपये देने वाले ग्राहक के खिलाफ नहीं चलाया जा सकता अनैतिक व्यापार का मुकदमा : हाईकोर्ट
प्रयागराज, 19 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति पर केवल पैसे देकर यौन संतुष्टि प्राप्त करने के आधार पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 की धारा 3, 5 और 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए किसी यौनकर्मी को पैसे देना अधिनियम के तहत वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को उपलब्ध कराने या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण के समान नहीं है।
जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने एक आरोपी नितिन की याचिका स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही, आरोपपत्र और समन आदेश रद्द कर दिया।
मामला गाजियाबाद का है। पुलिस को सूचना मिली थी कि भोजपुरा चौराहे के पास डीएलएफ पुलिस चौकी के नजदीक एक मकान में महिलाएं देह व्यापार में शामिल हैं। सूचना के आधार पर पुलिस ने मकान पर छापा मारा। मौके से 16 लोगों को पकड़ा गया जिनमें महिलाएं और सात पुरुष थे।
पुलिस के अनुसार वहां मौजूद महिलाओं ने बताया कि वे देह व्यापार में शामिल थीं और अपनी कमाई का एक हिस्सा उस व्यक्ति को देती थीं, जिसके मकान में वे मौजूद थीं। इसके बाद उसी दिन एफआईआर दर्ज की गई और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया।
मामले में आरोपित एक व्यक्ति ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। उसने आरोपपत्र, समन आदेश और उसके खिलाफ चल रही पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की। उसकी ओर से दलील दी गई कि अधिनियम की धारा 15(2) में छापेमारी के दौरान दो स्वतंत्र स्थानीय गवाहों की मौजूदगी से जुड़ी शर्त पूरी नहीं की गई। इसके अलावा एफआईआर में लगाए गए आरोपों को सही मान भी लिया जाए तो उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता, क्योंकि वह केवल ग्राहक के रूप में वहां गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय के एक पुराने फैसले दिनेश तिवारी उर्फ धीरेंद्र कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी हवाला दिया गया। उस मामले में कहा गया कि केवल ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाने वाला व्यक्ति वेश्यालय चलाने, उसका प्रबंधन करने या उसके संचालन में सहायता करने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोपी वेश्यालय के रूप में संचालित किए जा रहे मकान में छापेमारी के दौरान मौके पर पकड़ा गया और उसने पैसे देकर वेश्यावृत्ति कराई।
हालांकि, रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की भूमिका एक ग्राहक की ही थी। अदालत ने कहा कि वह व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए पैसे देकर वहां गया और उपलब्ध सामग्री से यह नहीं दिखता कि वह वेश्यालय चलाने या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण में शामिल था। अदालत ने कहा, “यदि कोई व्यक्ति ग्राहक के रूप में वेश्यालय जाता है तो अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उसने अपनी व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए यौनकर्मी की सेवा ली, लेकिन वह कानून में परिभाषित 'वेश्यावृत्ति के उद्देश्य' के लिए ऐसा नहीं करता, जिसमें व्यावसायिक शोषण आवश्यक तत्व है।”उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए पैसे देने वाले ग्राहक के खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 5 या 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इन धाराओं के तहत कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके बाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/त्वरित न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित पूरी कार्यवाही के साथ आरोपपत्र और समन आदेश को रद्द कर दिया।