हैंडलूम कॉर्पोरेशन के बर्खास्त कर्मचारी को हाईकोर्ट से राहत, 3 लाख रुपये मुआवजे का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रम न्यायालय के बहाली और पूरे बकाया वेतन के आदेश को संशोधित करते हुए दिनेश मिश्रा को एकमुश्त 3 लाख रुपये देने का निर्देश दिया।
प्रयागराज, 30 सितंबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यू.पी. स्टेट हैंडलूम कॉर्पोरेशन लिमिटेड की 2012 की याचिका को निस्तारित करते हुए श्रम न्यायालय, कानपुर के अवार्ड को संशोधित कर दिया है। कोर्ट ने पूर्ण वेतन सहित बहाली के आदेश के स्थान पर कर्मचारी दिनेश मिश्रा को 3 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने यह फैसला दिया है। दिनेश मिश्रा को 12 सितंबर 1985 को दैनिक वेतनभोगी टाइपिस्ट के रूप में नियुक्त किया गया था और 18 मार्च 1987 को उन्हें नियमित किया गया। कॉर्पोरेशन ने उन्हें 25 अप्रैल 2004 को छँटनी के तहत सेवा से हटा दिया। श्रम न्यायालय ने 24 मई 2012 के अवार्ड में छँटनी सूची को त्रुटिपूर्ण बताते हुए छँटनी को अवैध घोषित किया था और निरंतरता व पूरे बकाया वेतन के साथ बहाली का आदेश दिया था। कॉर्पोरेशन ने इसी अवार्ड को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
एक फैसले में छँटनी रद्द करने के आदेश को बरकरार रखते हुए बकाया वेतन के बदले 2 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवज़ा तय किया गया था। वहीं 2024 के मीना देवी मामले में अवार्ड रद्द कर मामला श्रम न्यायालय को नए सिरे से निर्णय के लिए भेज दिया गया था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के *महाराष्ट्र स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन बनाम महादेव कृष्ण नाइक* (2025) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि बर्खास्तगी रद्द होने पर पूरा बकाया वेतन स्वतः नहीं मिलता और कुछ मामलों में बहाली व बकाया वेतन के बजाय एकमुश्त मुआवज़ा अधिक उचित उपाय हो सकता है।
कोर्ट ने कर्मचारी की लगभग 19 वर्ष की सेवा (1985 से 2004), श्रम न्यायालय और हाईकोर्ट में मामले के लंबित रहने की अवधि को देखते हुए 3 लाख रुपये का मुआवज़ा उचित माना। कॉर्पोरेशन को यह राशि आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर कर्मचारी को अदा करनी होगी।