42 साल पहले पड़ी डकैती के तीन जीवित आरोपित बरी
--मिला संदेह का लाभ, पुलिस का लचर अभियोजन बना कारण
प्रयागराज, 16 फरवरी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चार दशक से अधिक समय से लम्बित वर्ष 1983 के एक आपराधिक अपील में फैसला सुनाते हुए तीन जीवित आरोपितों को डकैती के अपराध से बरी कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने दिया। कोर्ट ने सबूतों में विरोधाभास, साक्ष्यों की कमजोरी और पुलिस विवेचना की खामियों के आधार पर सत्र अदालत की सजा रद्द कर दी।
बदायूं के उझानी थाना क्षेत्र में 26-27 जुलाई 1982 की रात धनपाल के घर डकैती पड़ी। आरोप था कि गांव के ही सात लोगों ने घर में घुसकर मारपीट की और करीब 3,000 रुपये नकद व चांदी के जेवरात लूट लिए। विशेष सत्र न्यायाधीश, बदायूं ने 29 अगस्त 1983 को सभी सात आरोपितों को दोषी ठहराते हुए 5 से 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में अपील लम्बित रहने के दौरान चार आरोपितों की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई। शेष तीन अली हसन, हरपाल और लतूरी अब 70 वर्ष से अधिक आयु के हैं, जीवित बचे हैं।
अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट में मेल नहीं है। शिनाख्त भी संदिग्ध रही, जबकि पुलिस न तो लूट का माल बरामद कर सकी और न ही घटनास्थल से ठोस साक्ष्य जुटा पाई। साथ ही, पुरानी रंजिश के चलते झूठा फंसाने की सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया गया। उहापोह की स्थिति बनी रही। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने ‘संदेह का लाभ’ देते हुए तीनों आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया।