पुलिस हिरासत से लापता व्यक्ति पर डीजीपी को उच्च न्यायालय की फटकार
--कहा, 'अगर बंदी को समाप्त किया गया, तो एसपी को बख्शा नहीं जा सकता
प्रयागराज, 02 दिसम्बर । उत्तर प्रदेश पुलिस की कड़ी आलोचना करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2018 से पुलिस हिरासत से एक व्यक्ति के लापता होने को न्याय प्रणाली का " पूरी तरह से मजाक " करार दिया है।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की पीठ ने प्रदेश के डीजीपी को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि बंदी को 'समाप्त' कर दिया गया है, तो जिम्मेदारी केवल एक कनिष्ठ अधिकारी पर नहीं डाली जा सकती और ऐसी स्थिति में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) को " बख्शा नहीं जा सकता "।
कोर्ट ने यह टिप्पणी शिव कुमार (बंदी) के पिता द्वारा 2018 में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान की। शिव कुमार एक युवक है, जिसे कथित तौर पर सितम्बर 2018 में पुलिस ने अपहरण के एक मामले में उठाया था और तब से उसे नहीं देखा गया है। याचिका के अनुसार, उसके पिता पुलिस थाने गए और इंस्पेक्टर ने उन्हें आश्वासन दिया कि लड़की का बयान दर्ज होने के बाद उनके बेटे को रिहा कर दिया जाएगा।
हालांकि, लड़की मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हुई और उसने अपहरण से इनकार किया तथा कहा कि वह स्वेच्छा से घर से गई थी, लेकिन शिव कभी घर वापस नहीं लौटा। 25 नवम्बर को न्यायालय ने मामले की समय सीमा पर अप्रसन्नता व्यक्त की तथा कहा कि हाईकोर्ट का आदेश-पत्र, जिसमें कुल 22 आदेश हैं, पुलिस की वादा खिलाफी "एक किताब की तरह" है। सात वर्षों से पुलिस दावा कर रही थी कि बंदी का कोई पता नहीं चल रहा है और यह भी कहा जा रहा था कि वह नेपाल भाग गया होगा।
इन दावों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस "बंदी को पेश न करके इस न्यायालय की आंखों में धूल झोंक रही है "। पीठ ने कहा कि पुलिस द्वारा बंदी को ढूंढ़ने का प्रयास अभी भी जारी बताया जा रहा है, जो इसे "सरासर मज़ाक" के अलावा और कुछ नहीं बनाता।
हाईकोर्ट ने कहा " हम इसे उपहास कह रहे हैं, क्योंकि एक व्यक्ति, जिसे वर्ष 2018 में एक अपराध के सिलसिले में पुलिस स्टेशन में हिरासत में लिया गया था, वर्ष 2025 में भी लापता है। अब तक, पुलिस हिरासत में रहते हुए बिना किसी सुराग के गायब हुए सात साल हो चुके हैं। पुलिस हिरासत से इस तरह गायब होना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता"।
अदालत ने उनके लापता होने के संबंध में प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी पर भी गंभीर आपत्ति जताई। दरअसल, कथित घटना के लगभग तीन साल बाद, मार्च 2021 में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही एक उपनिरीक्षक और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ अपहरण और आपराधिक साजिश (आईपीसी की धारा 364 और 120-बी) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मामले में धीमी प्रगति को देखते हुए, पीठ ने डीजीपी को इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था।
28 नवम्बर को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्ण ने एक व्यक्तिगत हलफनामा दायर किया और अदालत को सूचित किया कि लाश का पता लगाने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (गोरखपुर जोन) के तहत एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया है।
पीठ ने बंदी का पता लगाने के लिए दस दिन की सख्त समय सीमा तय की और स्पष्ट किया कि पुलिस के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। पीठ ने कहा कि इस नियम का उत्तर केवल " बंदी को पेश करके या यह सबूत पेश करके दिया जा सकता है कि वह अब इस नश्वर दुनिया में नहीं है या देश छोड़ चुका है "। कोर्ट में सुनवाई के लिए अब यह मामला 9 दिसम्बर के लिए सूचीबद्ध है।