ईएसआई डॉक्टरों की तुलना पीएमएचएस से नहीं की जा सकती : हाईकाेर्ट
--समान लाभ का दावा खारिज, राज्य सरकार की विशेष अपील स्वीकार
प्रयागराज, 28 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि श्रम चिकित्सा सेवा के डॉक्टरों की तुलना प्रांतीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा के डॉक्टरों से नहीं की जा सकती। क्योंकि दोनों के कार्यों की प्रकृति और दायित्व पूरी तरह अलग हैं।
यह फैसला न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह एवं न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील पर अपर महाधिवक्ता अशोक मेहता एवं अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय व विपक्षी के वकील को सुनने के बाद अपील स्वीकार करते हुए दिया है। मामले के तथ्यों के अनुसार ईएसआई योजना के तहत श्रम चिकित्सा सेवा में कार्यरत डॉ राजेश पांडे ने पीएमएचएस डॉक्टरों के समान विशेष एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (एसएसीपी) के लाभ की मांग में याचिका दाखिल की थी। एकल पीठ ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें लाभ देने का आदेश दिया था, जिसे राज्य सरकार ने विशेष अपील में चुनौती दी थी।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने पाया कि पीएमएचएस डॉक्टर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक पूरे जनमानस का इलाज करते हैं, जिसमें जटिल सर्जरी और पोस्टमार्टम जैसे कार्य भी शामिल हैं। वहीं श्रम चिकित्सा सेवा (एलएमएस) के डॉक्टरों का कार्यक्षेत्र केवल बीमित व्यक्तियों तक सीमित है और वे केवल सामान्य या उचित उपचार प्रदान करने के लिए बाध्य हैं।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि डॉ राम नरेश शर्मा के मामले में दी गई समानता केवल सेवानिवृत्ति आयु से सम्बंधित थी। डॉ पीए भट्ट बनाम गुजरात राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णय का पालन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वेतन सम्बंधी लाभों के लिए केवल एक ही पैथी (एलोपैथी) का होना काफी नहीं है, कार्य की गंभीरता भी देखी जानी चाहिए। पीएमएचएस में पदोन्नति के सात स्तर हैं (महानिदेशक तक) जबकि श्रम चिकित्सा सेवा में केवल चार स्तर ही हैं।
कोर्ट ने माना कि श्रम चिकित्सा सेवा के डॉक्टरों पर कार्य का बोझ काफी कम है और उनकी सेवाएं विशिष्ट अनुबंधों के तहत संचालित होती हैं। इस आधार पर कोर्ट ने एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार की विशेष अपील स्वीकार कर ली।