सावन में गूंजी घोड़ों की टापें: संगम तट पर 200 वर्ष पुरानी 'गहरेबाजी' का रोमांच, जहां धर्म नहीं केवल हुनर बोलता है

संगम क्षेत्र के अरैल में सावन के प्रथम सोमवार पर हुआ पारंपरिक घुड़दौड़ और कौशल प्रदर्शन का भव्य आयोजन

सावन में गूंजी घोड़ों की टापें: संगम तट पर 200 वर्ष पुरानी 'गहरेबाजी' का रोमांच, जहां धर्म नहीं केवल हुनर बोलता है

प्रयागराज 03 अगस्तप्रयागराज की पावन धरा पर सावन के प्रथम सोमवार का सूर्योदय एक विशेष उत्साह और सांस्कृतिक परंपरा के साथ हुआ। संगम के तटवर्ती अरैल क्षेत्र में आयोजित पारंपरिक 'गहरेबाजी'—जो घोड़ों की अद्वितीय चाल, गति और घुड़सवारों के हुनर का एक भव्य प्रदर्शन है—ने एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक विरासत का लोहा मनवाया। यह आयोजन मात्र एक घुड़दौड़ नहीं, बल्कि प्रयागराज की सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब, सामाजिक सद्भाव और पशु-प्रेम का जीवंत दस्तावेज है।

इस ऐतिहासिक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और सुल्तानपुर जैसे प्रमुख शहरों से प्रशिक्षित घोड़े और अनुभवी घुड़सवार प्रयागराज पहुंचे, जिन्होंने अपनी कला से हजारों दर्शकों का मन मोह लिया।

क्या है 'गहरेबाजी' और कितना पुराना है इसका इतिहास?

'गहरेबाजी' सामान्य घुड़दौड़ से अलग एक विशिष्ट तकनीकी खेल है, जिसमें घोड़ों की रफ्तार के साथ-साथ उनकी पारंपरिक चाल, नियंत्रण और घुड़सवार के साथ उनके तालमेल की परीक्षा होती है।

स्थानीय इतिहासकारों और अनुभवी घुड़सवारों के अनुसार, यह परंपरा पिछले 200 वर्षों से भी अधिक समय से अनवरत चली आ रही है। कई जानकार इसकी ऐतिहासिक जड़ों को राजा हर्षवर्धन के काल से भी जोड़ते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम किसी व्यावसायिक या आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति को सहेजने और घोड़ों के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से किया जाता है।

प्रतियोगिता के सख्त नियम: 3 बार 'फाउल' पर सीधे बाहर

गहरेबाजी में जीत-हार से अधिक महत्व नियमों के पालन और अनुशासन का होता है। प्रतियोगिता में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सख्त नियमावली लागू की जाती है:

  • 'फाउल' का नियम: दौड़ के दौरान यदि कोई घोड़ा अपनी तय चाल (कदमताल) को छोड़कर सामान्य दौड़ने लगता है या तीन बार 'फाउल' करता है, तो उसे निर्णायक मंडल द्वारा तत्काल प्रतियोगिता से बाहर कर दिया जाता है।

  • नवंबर में मुख्य मुकाबला: सावन माह के प्रत्येक सोमवार को होने वाले इस साप्ताहिक कौशल प्रदर्शन के बाद, आगामी नवंबर माह में एक मुख्य प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसमें लगभग 15 किलोमीटर की कठिन और लंबी रेस का आयोजन होगा, जिसमें देश भर के शीर्ष घुड़सवार हिस्सा लेंगे।

गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारे की मिसाल

इस आयोजन का सबसे सशक्त और भावुक पहलू यहाँ दिखने वाला सांप्रदायिक सौहार्द है। सावन के पवित्र महीने में होने वाली यह प्रतियोगिता हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच आपसी भाईचारे की एक मजबूत कड़ी बन चुकी है।

आयोजन से जुड़े वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि इस खेल में घोड़े और घुड़सवार का धर्म मायने नहीं रखता; यहाँ केवल प्रतिभा, हुनर और आपसी प्रेम को महत्व दिया जाता है। दोनों समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर इस आयोजन की रूपरेखा तैयार करते हैं और इसे सफल बनाते हैं, जो वर्तमान समय में समाज के लिए एकता का एक बड़ा संदेश है।

समय के साथ निखरा व्यवस्थाओं का स्वरूप

पिछले पांच दशकों से इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी रहे स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि समय के साथ 'गहरेबाजी' का स्वरूप और अधिक सुव्यवस्थित तथा भव्य हुआ है। पुराने समय में सीमित संसाधनों के बीच यह आयोजन होता था, लेकिन अब प्रशासनिक सहयोग, सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था और संगम तट पर दर्शकों के लिए बैठने के उचित इंतजामों ने इस विरासत को और भी आकर्षक बना दिया है।

पड़ोसी जिलों से उमड़ा जनसैलाब, युवाओं को सौंपी जा रही विरासत

अरैल के घाटों पर घोड़ों की टापें सुनने और इस अनूठे कौशल को देखने के लिए केवल प्रयागराज ही नहीं, बल्कि मिर्जापुर, वाराणसी और अयोध्या जैसे पड़ोसी जनपदों से भी भारी संख्या में दर्शक पहुंचे।

दर्शकों का मानना है कि सावन के पवित्र माह में घोड़ों की यह दौड़ और उनमें दिखने वाली ऊर्जा भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और उल्लास का प्रतीक है। संगम तट पर उमड़ी हजारों नागरिकों की भीड़ और युवाओं की बढ़ती भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि प्रयागराज की सांस्कृतिक नींव आज भी उतनी ही मजबूत है। यह खेल अब नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, धैर्य, अनुशासन और गौरवशाली इतिहास से रूबरू करा रहा है।

न्यूज़ डेस्क की राय:

प्रयागराज की यह 'गहरेबाजी' हमें याद दिलाती है कि परंपराएं केवल किताबों या संस्मरणों में नहीं, बल्कि पूरे समाज के स्नेह, संयुक्त संरक्षण और साझी विरासत से ही सदियों तक जीवित रहती हैं।