वकीलों की गैरमौजूदगी और कोर्ट का कामकाज बाधित होने पर हाईकोर्ट सख्त, मांगी रिपोर्ट

सहमति वाले संबंध को बाद में अपराध बताने वाली FIR में याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर भी लगाई रोक

वकीलों की गैरमौजूदगी और कोर्ट का कामकाज बाधित होने पर हाईकोर्ट सख्त, मांगी रिपोर्ट

प्रयागराज, 04 नवंबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को वकीलों द्वारा कोर्ट रूम के दरवाज़े रोकने और कामकाज ठप करने की कोशिश पर कड़ी नाराजगी जताई। हालांकि सहमति से बने संबंध को बाद में अपराध बनाने के आरोप वाली एक एफआईआर में याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।

न्यायालय नंबर 10 में न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने सलमान अख्तर व 2 अन्य की याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी के लिए कोई अधिवक्ता नहीं आया। जबकि कॉज़ लिस्ट में अधिवक्ताओं के नाम दर्ज थे। सरकारी वकील भी अदालत में उपस्थित नहीं थे।

न्यायालय ने दर्ज किया कि बड़ी संख्या में वकीलों ने बाहर खड़े होकर कोर्ट के प्रवेश द्वार बंद कर दिए और शोर मचाया, जिससे कार्यवाही बाधित हुई। मुख्य गेट से कोर्ट स्टाफ को भीतर नहीं आने दिया गया, तो पीठ ने स्टाफ को न्यायाधीशों के लिए बने दरवाज़े से प्रवेश करने को कहा। पीठ ने स्पष्ट कहा कि जानबूझकर ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले वकीलों के कारण अदालती कार्यवाही ठप नहीं हो सकती और शासकीय अधिवक्ता को अपर शासकीय अधिवक्ता की अनुपस्थिति के कारणों पर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया।

न्यायालय ने कहा कि एफआईआर में ही याचिकाकर्ता संख्या 1 और प्रथम सूचनाकर्ता के बीच सहमति से संबंध और शारीरिक संबंध होने का उल्लेख है। याचिका से यह भी सामने आया कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति विवाद है। पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि एफ आई आर के ज़रिए सहमति वाले संबंध को पूर्वव्यापी रूप से अपराध बनाने और दीवानी विवाद में आपराधिक कार्यवाही को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश दिखती है।

न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के सलीब उर्फ शालू उर्फ सलीम केस के फैसले का हवाला दिया। उसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि बदले की भावना से दर्ज झूठे मामलों में एफआईआर रद्द करने की मांग पर अदालत को केवल आरोपों तक सीमित न रहकर आसपास की परिस्थितियों और जांच में जुटाई सामग्री को भी देखना चाहिए और पंक्तियों के बीच पढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

न्यायालय ने प्रथम सूचनाकर्ता को नोटिस जारी की। राज्य सरकार को चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया और अगली सुनवाई तक, या पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक (जो पहले हो), याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। मामला थाना जहांगंज, जिला फर्रुखाबाद में दर्ज केस से जुड़ा है।