इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर अधिकारियों को हर्जाना भरने की चेतावनी

अभिषेक त्यागी के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई रद्द, हाईकोर्ट ने ₹50 हजार हर्जाना देने का आदेश दिया; संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूली की भी अनुमति।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर अधिकारियों को हर्जाना भरने की चेतावनी

प्रयागराज, 16 सितंबर  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि कोर्ट के लगातार फैसलों के बावजूद, उत्तर प्रदेश के अधिकारी और राज्य सरकार 'यूपी गुंडा एक्ट' का इस्तेमाल दमन के हथियार के तौर पर कर रहे हैं। जस्टिस संदीप जैन की कोर्ट ने कहा कि नौकरशाही को गैर-कानूनी और मनमाने आदेश जारी करना बंद करना होगा, वरना उन्हें हर्जाना भरना पड़ सकता है।

बेंच ने कहा, "अब तक यह कोर्ट उन अधिकारियों पर हर्जाना लगाने से बचता रहा है, जो 1970 के एक्ट के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए लगातार मनमाने आदेश जारी कर रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया कि नौकरशाही को कड़ा संदेश दिया जाए कि वे ऐसा करना बंद करें, वरना 1970 के एक्ट के तहत शक्तियों के मनमाने और गैर-कानूनी इस्तेमाल के लिए उन्हें हर्जाना भरना पड़ सकता है।"

एकल जज ने गाजियाबाद के अभिषेक त्यागी की याचिका को मंज़ूर करते हुए यह टिप्पणी की। त्यागी ने 'उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ़ गुंडाज एक्ट, 1970' के तहत अपने खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती दी थी। कोर्ट ने गाजियाबाद के एडिशनल कमिश्नर ऑफ़ पुलिस और मेरठ डिवीज़न के कमिश्नर के आदेशों को रद्द किया और याचिकाकर्ता को 50,000 का हर्जाना देने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार संबंधित अधिकारियों की सैलरी से हर्जाने की रकम वसूल सकती है।

मामले के अनुसार याची के खिलाफ कार्यवाही दो आपराधिक मामलों के आधार पर शुरू की गई। गाजियाबाद के एडिशनल कमिश्नर ऑफ़ पुलिस ने 18 सितंबर, 2025 के आदेश से त्यागी को अपने स्थायी पते पर रहने और छह महीने तक हर दूसरे और चौथे शनिवार को संबंधित पुलिस स्टेशन में अपनी हाज़िरी लगाने का निर्देश दिया। बाद में 10 दिसंबर, 2025 को मेरठ डिवीज़न के कमिश्नर ने आदेश के खिलाफ उनकी अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट के सामने त्यागी ने तर्क दिया कि सिर्फ़ दो आपराधिक मामलों के आधार पर उन्हें "गुंडा" नहीं कहा जा सकता।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने कहा कि इन दो मामलों से पता चलता है कि त्यागी आदतन अपराधी हैं और एक्ट के तहत की गई कार्रवाई सही थी। उच्च न्यायालय ने पहले के कई फैसलों का ज़िक्र किया जिनमें 'गुंडा एक्ट' के तहत 'आदतन' शब्द का मतलब समझाया गया है। इन मामलों में यह माना गया कि इस शब्द का मतलब 'बार-बार' या 'लगातार' है। इसके लिए एक जैसी बार-बार की जाने वाली गतिविधियों में निरंतरता का होना ज़रूरी है। इन फैसलों के अनुसार, आदत का निष्कर्ष निकालने के लिए "बार-बार, लगातार और एक जैसी गतिविधियां ज़रूरी हैं, न कि अलग-अलग, अकेली और अलग-अलग तरह की गतिविधियां"।

कोर्ट ने लखनऊ बेंच के हालिया फैसले राहुल उर्फ राहुल सरोज बनाम यूपी राज्य व अन्य का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि आरोपित को इस एक्ट के तहत अपराधों में 'आदतन' शामिल मानने के लिए "आरोपी की एक या दो गतिविधियां काफी नहीं होंगी"। इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि त्यागी को सिर्फ़ दो आपराधिक मामलों के आधार पर 'गुंडा' करार दिया गया था। अहम बात यह है कि दोनों मामलों की घटनाओं के बीच 3 साल का अंतर था, जिससे कोर्ट के अनुसार यह पता चलता है कि वह आदतन अपराधी नहीं है। इसलिए कोर्ट ने माना कि 1970 के एक्ट के तहत कार्यवाही बरकरार नहीं रखी जा सकती और 18 सितंबर और 10 दिसंबर, 2025 के आदेशों को रद्द कर दिया।

फैसला सुनाने से पहले कड़ी टिप्पणियों में कोर्ट ने कहा कि इस "लगातार रुख" के बावजूद कि सिर्फ़ एक या दो मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' नहीं कहा जा सकता, नौकरशाही ने "जानबूझकर इस पर ध्यान नहीं दिया" और इसके उलट आदेश जारी करती रही।

कोर्ट ने आगे कहा कि अब नौकरशाही को कड़ा संदेश देने का समय आ गया कि वे ऐसा व्यवहार बंद करें, वरना उन्हें दंडात्मक हर्जाना भरना पड़ सकता है। इसके अनुसार, कोर्ट ने त्यागी को 'गुंडा' घोषित किए जाने से हुई परेशानी और पीड़ा के लिए 50 हजार का हर्जाना लगाया है। राज्य को संबंधित अधिकारियों की सैलरी से यह रकम वसूलने की इजाज़त दी। हर्जाने की रकम एक महीने के अंदर चुकाने का निर्देश दिया गया है।