43 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, गिरधारी की सजा 10 से घटकर 5 साल; दोषसिद्धि बरकरार

1980 के मुरादाबाद हत्याकांड में हाईकोर्ट ने धारा 304 भाग-II के तहत दोषसिद्धि कायम रखी, लेकिन घटना के लंबे समय से लंबित रहने और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए सजा घटा दी।

43 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, गिरधारी की सजा 10 से घटकर 5 साल; दोषसिद्धि बरकरार

प्रयागराज, 29 सितंबर 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1980 के मुरादाबाद हत्या कांड में 43 साल से लंबित अपील पर फैसला सुनाते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन सज़ा 10 साल के सश्रम कारावास से घटाकर 5 साल कर दी है।

न्यायमूर्ति संतोष राय ने यह निर्णय सुनाया ।

अभियोजन के अनुसार 27 दिसंबर 1980 को शाम करीब 5.30-5.45 बजे मुरादाबाद के थाना सिविल लाइंस क्षेत्र में लालमन अपने भाई शेर सिंह के साथ नेतराम की चाय की दुकान के सामने बैठा था। तभी चचेरा भाई गिरधारी कुल्हाड़ी लेकर आया और लालमन के सिर पर कुल्हाड़ी के उल्टे हिस्से से वार कर भाग गया। घायल लालमन ने 30 दिसंबर 1980 को दम तोड़ दिया। पैतृक जमीन के बंटवारे को लेकर परिवार में पहले से विवाद चल रहा था।

मुरादाबाद के अपर सत्र न्यायाधीश ने 27 अक्टूबर 1983 को गिरधारी को धारा 302 के बजाय धारा 304 भारतीय दंड संहिता में दोषी ठहराते हुए 10 साल के सश्रम कारावास की सजा दी थी। इसी के खिलाफ अपील दाखिल हुई।

अपीलार्थी के अधिवक्ता ने कहा कि चिकित्सकीय रिपोर्ट में

फटा हुआ घाव कुल्हाड़ी से मेल नहीं खाता, चाय दुकान के मालिक से पूछताछ नहीं हुई, एक गवाह पक्षद्रोही हो गया, स्थल-नक्शे में विसंगतियां थीं और इलाज में देरी या कमी से भी मौत संभव है। साथ ही मामला अधिकतम धारा 304 भाग-II का बनता है,।

कोर्ट ने कहा,शेर सिंह की मौके पर मौजूदगी स्वाभाविक है और जिरह में भी संदिग्ध नहीं हुई। उसकी गवाही को मेडिकल साक्ष्य से भी समर्थन मिला।

कोर्ट ने कहा कि कुल्हाड़ी के भोथरे हिस्से से भी फटा हुआ घाव संभव है, इसलिए मेडिकल और चश्मदीद विवरण में विरोधाभास नहीं है। सिर में गंभीर चोट और खोपड़ी की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई।एक गवाह के मुकरने से अभियोजन का मामला खारिज नहीं होता; उसे छोड़ भी दें तो दो गवाह और मेडिकल साक्ष्य पर्याप्त हैं।

धारा 299 भारतीय दंड संहिता की व्याख्या-2 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि इलाज से मौत टल सकती थी, यह तर्क चोट पहुंचाने वाले को दोषमुक्त नहीं करता।

कोर्ट ने कहा कि घटना नक्शे में मामूली विसंगति से भरोसेमंद चश्मदीद साक्ष्य खारिज नहीं हो सकता।

कोर्ट ने माना कि सिर जैसे नाज़ुक अंग पर वार से आरोपी को यह ज्ञान था कि मौत हो सकती है, लेकिन इरादा साबित नहीं हुआ, क्योंकि केवल एक वार हुआ, वह भी कुल्हाड़ी के उल्टे हिस्से से, बार-बार हमला नहीं हुआ और पूर्व नियोजित साजिश का सबूत नहीं मिला। इसलिए मामला धारा 304 भाग-II में आता है।

उच्च न्यायालय ने घटना के 43 साल पुराने होने, अपील के लंबे समय तक लंबित रहने, एक ही वार और भोथरे हिस्से के इस्तेमाल को देखते हुए सज़ा 10 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष सश्रम कारावास कर दी। कोई जुर्माना नहीं लगाया गया। हिरासत में बिताई गई अवधि का लाभ मिलेगा।

जमानत पर चल रहे गिरधारी को 10 दिन के भीतर संबंधित निचली अदालत में आत्मसमर्पण करना होगा। जमानत बंधपत्र रद्द कर दिए गए हैं। ऐसा न करने पर निचली अदालत उसे हिरासत में लेने के लिए कानूनी कदम उठाएगी।