महाशिवरात्रि पर्व भक्ति के रंग में रंगा माहौल
महाशिवरात्रि पर्व भक्ति के रंग में रंगा माहौल
गुप्तकाशी, 15 फ़रवरी । शिव पार्वती विवाह तिथि हो या फिर भगवान शिव के लिंग रूप में प्रादुर्भाव के रूप में प्रसिद्ध महाशिवरात्रि व्रत पर्व पर केदारघाटी के विभिन्न शिव मंदिरों में प्रात कालीन से देर रात तक श्रद्धालुओं की खासी भीड़ रही । इस दौरान शिव भक्तों ने चार प्रहर की पूजा अर्चना का संकल्प लिया साथ ही पंचोपचारादि पूजा अर्चना कर क्षेत्र की सुख और समृद्धि की कामना भी की ।
शास्त्रों के अनुसार इसी दिन पर महाशिव और मां पार्वती का वैवाहिक कार्यक्रम सप्तपदी का के साथ ही संपन्न हुआ था। एक अन्य कथा के अनुसार समुद्र मंथन के बाद निकले विष को ग्रहण करने पर भगवान शंकर का नीलकंठ नाम भी इसी दिन से मना जाता है। मान्यता यह भी है कि समुद्र मंथन के बाद हलाहल विष निकलने पर दुनिया के नष्ट हो जाने से पूर्व महा शिव ने इस हलाहल विष का पान कर दिया था । इस विष के उदर में जाने से पूर्व मां पार्वती ने महाशिव के गले को दोनों हथेलियां से पकड़ लिया था। जिस कारण विश्व गले में ही समाहित हो गया। जिस कारण भगवान शिव का रंग नीला पड़ गया। उसी दिन से भगवान का एक नया नाम नीलकंठ भी पड़ जाता है।
वहीं दूसरी कथाओं के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए गौरीकुंड गोरी माई मंदिर में कई वर्षों तक पूजा अर्चना की। तत्पश्चात त्रियुगी नारायण में शिव पार्वती का वैवाहिक रस्म पूरी हुई। इसी दिन शिव भक्तों द्वारा चार प्रहर की पूजाएं संपन्न करके रुद्राभिषेक कर भांग घोटा को प्रसाद रूप में बांटा जाता है। माना यह जाता है कि भगवान शिव के गले में व्याप्त विष को ही यह भांग रूप में मानकर इसे भक्तों में बांटा जाता है। महाशिवरात्रि के दिन विश्वनाथ मंदिर, ओंकारेश्वर, कोटेश्वर, नल ईश्वर, कोटिमाहेशवरी, त्रियुगी नारायण समेत तमाम शिव मंदिरों में भक्तों की खासी भीड़ रही।
बाबा केदारनाथ जी के कपाट खुलने की तिथि भी इसी दिन तय की जाती है । जो कि इस वर्ष 22 अप्रैल को तय की गई है। विद्वान आचार्य हिमांशु से हिमालय बताया कि जो व्यक्ति जो भक्त महाशिवरात्रि व्रत पर भगवान शंकर की चार प्रहर की पूजा पूर्ण करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है रुद्राभिषेक जलाभिषेक दुग्ध दुग्ध अभिषेक करके यज्ञोपवीत भांग पत्र चढ़ाने से सभी लोग लोगों की कामनाएं पूर्ण होती है।