आत्मबोध से विश्वबोध की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव भारत बोध : डॉ पवनपुत्र बादल

--हिन्दुस्तानी एकेडेमी में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी

आत्मबोध से विश्वबोध की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव भारत बोध : डॉ पवनपुत्र बादल

प्रयागराज, 14 फरवरी । हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज के तत्वावधान एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् काशी प्रांत के संयोजन में शनिवार को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम एकेडेमी परिसर में स्थापित पं0 बालकृष्ण भट्ट, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन एवं सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. पवनपुत्र बादल, राष्ट्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, लखनऊ ने कहा कि आत्मबोध से विश्ववोध की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव भारत बोध है। वस्तुतः यही भारत बोध हमारे सनातन का दायित्व बोध है। भारतीय जीवन मूल्यों और परम्पराओं पर विचार रखते हुये उन्होंने कहा कि सदियों से हमारे यहां साहित्य संवाद की परम्परा के केन्द्र ले रहे हैं। प्रयाग में आयोजित कुम्भ मेला भारत की चेतना का साक्षात प्रमाण है। हमारा दायित्व है कि अपनी गौरवशाली परम्पराओं को हम पुनः प्रचलन में लाएं।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता प्रदेश महामंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, लखनऊ, उरई डॉ. महेश बजरंग ने कहा कि कोई भी राष्ट्र जब अपने स्वबोध अथवा कहे आत्मबोध को विस्मृत करने लगता है तब उस राष्ट्र का पतन होना आरम्भ हो जाता है। जिस समाज ने अपनी सनातन परम्पराओं अपने पूर्वजों की विरासत पर गर्व न करके उसे भुला दिया था। उसे हीन समझने लगा। उसका अस्तित्व संसार में बचा नहीं है, उनका इतिहास मिट गया है। हमारी लोक कलाएं लोक गाथाएं, लोकपर्व, लोकभाषा, लोकनाट्य, लोकगीत, लोकमेले, लोकदेवता आदि सभी हमारे आत्मबोध में महत्वपूर्ण कारण है। यही परम्परा सनातन को सर्द और सृदढ़ बनाती है।

संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. विनम्र सेन सिंह, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने कहा कि आत्मबोध से विश्वबोध की यह यात्रा स्व से सर्व की यात्रा है। आज की यह संगोष्ठी प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ऐसा बोध जागृत करेगी जो प्रयाग से सम्पूर्ण भारत की अनुगूंज बनेगा। ‘हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे, अभी आओ विचारे मिलकर ये समस्याएं सभी इस भाव बोध पर विचार करते हुए आज की युवा पीढ़ी को आत्म से सर्व की ओर यात्रा करने की आवश्यकता है। जिससे भारत को पुनः विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सके।

सगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’ ने कहा कि मानव जीवन में बहुत कुछ देखने, परखने, समझने, बोलने का समय मिलता है किन्तु भाव व्यक्त करने से पहले अपने से पूछें, समझे तभी बोलिये क्योंकि आत्मबोध से ही आप तत्वबोध तक सही रूप से पहुंच सकते हैं और समाज को जानने, समझने का बोध ही विश्वबोध है।

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए एकेडेमी कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने कहा कि समाज के हर व्यक्ति के लिए आत्मबोध और विश्वबोध दो ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं जो हमारे जीवन को एक आंतरिक अर्थ और दिशा प्रदान करते हैं। आत्मबोध का अर्थ स्वयं की आंतरिक दुनिया को जानना, समझना और अपने प्रभाव व कमजोरियों, विचारों और भावनाओं को भली भांति जानना है। यह एक व्यक्तिगत और आंतरिक खोज है जो हमें अपने अस्तित्व के मूल को समझने में मदद करती है। विश्वबोध का अर्थ समाज, संस्कृतियों, और प्रक्रियाओं को जानना और समझना। हमें अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से बाहर देखने और दूसरों के साथ व्यवहार की क्षमता देता है।

संगोष्ठी का संचालन अनुभव दुबे, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में डॉ. शमशेर जम्दाग्नि, डॉ. मिथलेश त्रिपाठी, डॉ. लहरी राम मीणा, डॉ. कल्पना वर्मा, डॉ. उषा मिश्रा, डॉ. विरेन्द्र कुमार तिवारी, डॉ. रमेश सिंह, स्नेह सुधा, विवेक सत्यांशु, गोपालजी पाण्डेय, एम.एस. खान सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।