मूल किरायेदार की मौत के बाद सभी वारिसों को बेदखली केस में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं : हाईकोर्ट

मूल किरायेदार की मौत के बाद सभी वारिसों को बेदखली केस में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 16 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने किरायेदारी कानून के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। एक निर्णय में स्पष्ट किया है कि किरायेदार की मौत के बाद सभी कानूनी वारिसों को बेदखली केस में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है। मूल किरायेदार की मृत्यु के बाद उसकी किरायेदारी सभी कानूनी वारिसों पर ‘संयुक्त किरायेदारी’ के रूप में हस्तांतरित होती है। किसी एक के खिलाफ केस चल सकता है और मकान मालिक के लिए सभी वारिसों को अलग-अलग पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है।

न्यायमूर्ति डॉ योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने वाराणसी निवासी आशीष कुमार अग्रवाल की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट तथा पुनरीक्षण अदालत के निर्णय को बरकरार रखा है। कहा है कि ट्रायल कोर्ट किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन नहीं देते हुए मामले की सुनवाई तेजी से करे तथा अधिकतम छह महीने में इसे सुलझाए।

कोर्ट ने कहा, किसी एक वारिस-संयुक्त किरायेदार के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही चलाई जा सकती है और डिक्री सभी पर बाध्यकारी होगा। अपवाद तब हो सकता है जब कोई यह दावा करे कि उसे किरायेदारी से अलग किया गया है अथवा उसका हित अलग है तो उसे अपना केस साबित करना होगा। कोर्ट ने इस सिलसिले में एचसी पांडेय बनाम जीसी पाल, कांजी मांझी बनाम ट्रस्टी आफ पोर्ट आफ बांबे में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख किया है। कहा है कि यह सिद्धांत यूपी अर्बन बिल्डिंग एक्ट के तहत भी लागू होता है।

मुकदमे से जुड़ा तथ्य यह था कि लघु वाद अदालत में 2014 में चित्रकूट रामलीला समिति, रामकृष्ण अग्रवाल व अखिल अग्रवाल ने किरायेदार कृष्ण गोपाल गुप्ता की बेदखली के लिए वाद दायर किया। कृष्ण गोपाल की 14 फरवरी 2019 को मृत्यु हो गई तो 18 फरवरी 2021 को ट्रायल कोर्ट ने याची आशीष को अकेले पक्षकार बनाया। इसके बाद 27 अप्रैल 2022 को उसकी अनुपस्थिति में एकपक्षीय कार्यवाही हुई। इसके खिलाफ रिकाल एप्लीकेशन (आदेश वापसी आवेदन) दिया गया जिसे ट्रायल कोर्ट ने 18 अगस्त 2023 को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया तथा एकपक्षीय कार्यवाही रद्द कर दी, लेकिन 18 फरवरी 2021 का आदेश रद्द करने से इनकार कर दिया।

चुनौती दिए जाने पर पुनरीक्षण अदालत ने 26 नवम्बर 2025 को ट्रायल कोर्ट का जुलाई 2023 का आदेश सही ठहराया। उक्त आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याची के अधिवक्ता का कहना था कि ट्रायल व पुनरीक्षण अदालत ने कृष्ण गोपाल गुप्ता के सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को शामिल किए बिना वाद को आगे बढ़ाने में कानूनी त्रुटि की है।