प्रयागराज: संगम की रेत पर उकेरा गया 'युद्ध का खौफनाक मंजर', सैंड आर्ट के जरिए दुनिया को दी गई 'शांति की पुकार'

'आधा इंसान, आधा कंकाल': प्रयागराज की रेत पर दिखा तीसरे विश्व युद्ध का खौफ!

प्रयागराज: संगम की रेत पर उकेरा गया 'युद्ध का खौफनाक मंजर', सैंड आर्ट के जरिए दुनिया को दी गई 'शांति की पुकार'

रिपोर्टर/डेस्क: प्रयागराज न्यूज़ वेब डेस्क : इज़राइल-ईरान तनाव और दुनिया भर में मंडराते विश्व युद्ध के खतरे के बीच, धर्म और शांति की नगरी प्रयागराज से एक बहुत ही प्रभावशाली संदेश सामने आया है। संगम तट पर 'संगम सैंड आर्ट ग्रुप' ने रेत पर एक मार्मिक कलाकृति उकेरी है। आधा कंकाल, एक सहमा हुआ बच्चा और उड़ते हुए कबूतर की यह तस्वीर दुनिया के शक्तिशाली देशों को बता रही है कि युद्ध से केवल विनाश मिलता है, इसलिए "मानवता के द्वार खोलें, युद्ध के नहीं।"


दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठी है। ग्लोबल वार्मिंग जैसी प्राकृतिक चुनौतियों से जूझ रही धरती अब मानव-निर्मित विनाश के मुहाने पर खड़ी है। मध्य पूर्व में इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव हो, या रूस और यूक्रेन के बीच सालों से चल रहा संघर्ष— हर तरफ तबाही का मंजर है। कूटनीतिक चेतावनियों और मिसाइलों की गूंज के बीच, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से शांति और इंसानियत की एक मूक लेकिन बेहद शक्तिशाली पुकार उठी है।

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम तट पर, जहाँ लाखों श्रद्धालु शांति की तलाश में आते हैं, वहां के स्थानीय कलाकारों ने अपनी कला के जरिए दुनिया को एक ऐसा आईना दिखाया है जिसे देखकर हर किसी की रूह कांप जाए।

रेत पर उकेरी गई 'तबाही और शांति' की कहानी

प्रसिद्ध सैंड आर्टिस्ट अजय कुमार गुप्ता के नेतृत्व में 'संगम सैंड आर्ट ग्रुप' ने संगम की रेत पर "युद्ध बनाम मानवता (War vs Humanity)" विषय पर एक विशाल और दिल दहला देने वाली सैंड आर्ट (रेत कलाकृति) का निर्माण किया है। इस कलाकृति को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह एक ही नज़र में युद्ध की भयावहता और शांति की सुंदरता के बीच का अंतर स्पष्ट कर देती है।

कलाकृति की मुख्य विशेषताएं:

  • दोहरे पहलू वाला चेहरा: रेत से एक विशाल चेहरा बनाया गया है, जिसे दो हिस्सों में बांटा गया है। दाईं ओर का हिस्सा एक सामान्य, शांत इंसान का है, जो नीले और पीले रंगों से सजा है। यह जीवन, आशा और एक सुरक्षित दुनिया का प्रतीक है।

  • खौफनाक कंकाल (Skull): चेहरे का बायां हिस्सा एक डरावने कंकाल में तब्दील हो चुका है। यह कंकाल युद्ध में होने वाली मौतों, त्रासदी और खंडहर हो चुके शहरों का सीधा प्रतीक है।

  • सहमा हुआ मासूम बच्चा: कंकाल वाले हिस्से के ठीक नीचे एक छोटा बच्चा उकेरा गया है, जो डरा हुआ है और खुद को समेटे हुए है। यह दर्शाता है कि युद्ध की सबसे भारी कीमत आने वाली पीढ़ियों और मासूम बच्चों को चुकानी पड़ती है।

  • शांति का दूत कबूतर: हरियाली और जीवन वाले हिस्से में एक कबूतर (Dove) उड़ता हुआ दिखाया गया है, जो सदियों से विश्व शांति का प्रतीक रहा है।

  • स्पष्ट संदेश: कलाकृति के एक तरफ अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में लिखा है- "OPEN HUMANITY, NOT WAR" (मानवता के द्वार खोलें, युद्ध के नहीं)।

"पूरी दुनिया वाइब्रेट कर रही है" - क्या कहते हैं कलाकार?

इस मार्मिक कलाकृति को आकार देने वाले मुख्य सैंड आर्टिस्ट अजय कुमार गुप्ता ने प्रयागराज न्यूज़ से बातचीत में अपने विचार साझा किए।

अजय गुप्ता ने कहा, "आज दुनिया के जो हालात हैं—खासकर इज़राइल, ईरान और अमेरिका को लेकर—उससे पूरी दुनिया में एक डर का माहौल है, पूरी दुनिया जैसे वाइब्रेट कर रही है। हमने संगम तट पर यह भव्य आकृति इसीलिए बनाई है ताकि हम बता सकें कि युद्ध से देश किस तरह तहस-नहस हो जाते हैं। युद्ध से सिर्फ कंकाल और तबाही बचती है। इस कला के जरिए हम वैश्विक नेताओं और समाज से यही अपील कर रहे हैं कि विश्व में शांति स्थापित हो और मानवता को प्राथमिकता दी जाए।"

इस सैंड आर्ट को तैयार करने में अजय कुमार गुप्ता के साथ उनकी टीम के युवा और होनहार सदस्यों— कलश दूरियां, अदिति त्रिपाठी और प्रिंस गुप्ता— ने भी अहम भूमिका निभाई है।

पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच बना आकर्षण का केंद्र

संगम तट पर आने वाले श्रद्धालुओं, युवाओं और विदेशी पर्यटकों के लिए यह सैंड आर्ट आकर्षण और चिंतन का मुख्य केंद्र बन गई है। जो भी इस रास्ते से गुजर रहा है, वह ठिठक कर इस कलाकृति को निहारने पर मजबूर है। लोग इसकी तस्वीरें ले रहे हैं और सोशल मीडिया पर #NoToWar और #PeaceForHumanity जैसे हैशटैग के साथ इसे शेयर कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि जो बात दुनिया के बड़े-बड़े नेता और कूटनीतिज्ञ नहीं समझा पा रहे हैं, वो बात प्रयागराज के इन कलाकारों ने कुछ मुट्ठी रेत से समझा दी है।

निष्कर्ष: रेत मिट जाएगी, लेकिन संदेश अमर है

रेत की फितरत हवा और पानी के साथ मिट जाने की होती है। शायद कुछ दिनों में संगम की लहरें या तेज हवाएं इस कलाकृति को मिटा देंगी, लेकिन इसने लोगों के जेहन में जो सवाल खड़े किए हैं, वे आसानी से नहीं मिटेंगे। क्या हम अपनी आने वाली नस्लों को एक हरा-भरा और शांत संसार देना चाहते हैं, या फिर राख और कंकालों का ढेर?

'संगम सैंड आर्ट ग्रुप' की यह पहल इस बात का प्रमाण है कि कला सिर्फ सजावट का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज को जगाने और पूरी दुनिया तक अपनी आवाज़ पहुंचाने का एक सबसे सशक्त माध्यम है।