‘आधुनिक मीराँ’ महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि आज, प्रयागराज से जुड़ी साहित्य-साधना को किया गया याद

‘आधुनिक मीराँ’ महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि आज, प्रयागराज से जुड़ी साहित्य-साधना को किया गया याद

‘आधुनिक मीराँ’ महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि आज, प्रयागराज से जुड़ी साहित्य-साधना को किया गया याद

एक हठधर्मी और मुखर कवयित्री का आज निधन-दिनांक है; क्योंकि ११ सितम्बर, १९८७ ई० को महीयसी महादेवी वर्मा जी का इलाहाबाद (वर्तमान मे प्रयागराज) में शरीरान्त हो गया था, जो उनकी कर्मभूमि थी। जहाँ तक उनकी जन्मभूमि का विषय है तो उनका जन्म २६ मार्च, १९०७ ई० को संयुक्त प्रान्त आगरा-अवध के फ़र्रुखा़बाद मे हुआ था। बताया जाता है कि उनके परिवार में दौ सौ वर्ष किसी कन्या का जन्म हुआ था; यानी सात पीढ़ियों के बाद। उनके बाबा बाबू बाँकेबिहारी उस कन्यारत्न की प्राप्ति से इतने उत्फुल्ल हुए थे कि उन्होंने उसका नामकरण 'महादेवी' कर दिया था। उस कन्या के पिता गोविन्दप्रसाद वर्मा और माता हेमरानी देवी ने यथाशक्य लालन-पालन किया। पिता एक अध्यापक थे, जबकि माँ धर्मपरायण गृहिणी और विदुषी थीं।

वे हिन्दी और संस्कृत-भाषाओं की जानकार थीं। यद्यपि उनका बाल विवाह स्वरूपनारायण वर्मा के साथ हुआ था तथापि उन्होंने आजीवन एक 'अविवाहिता' के रूप मे जीवन-यापन किया था और आजीवन श्वेत-वसना रहीं। उन्होंने अपने पति से पुनर्विवाह करने के लिए आग्रह भी किया था; परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल पायी। उनके भीतर एक आक्रोश था, हठधर्मिता थी और थी, उन्मुक्त वैचारिक विचरण के विरुद्ध खड़ी की गयी वर्ज्य दीवारों को चुनौती देनेवाली प्रतिकार की मन: दशा। वे सुशिक्षिता के रूप मे समाज के सम्मुख स्वयं को प्रस्तुत करना चाहती थीं। वे बालपन से ही सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार, विशेषत: नारी-उत्पीड़न को निकट से देखती आ रही थीं, इसलिए 'वैवाहिक सम्बन्ध' के प्रति उनका मोहभंग हो चुका था। वे अपनी अनन्य सखी 'कविता-कामिनी' को साथ लेकर अपने जीवन का सारस्वत शृंगार करने की अभिलाषी थीं। उनकी वेदना में जिस अनुभूति की गहनता का दर्शन होता है, उसमे उनकी व्यक्तिगत पीड़ा, करुणा तथा उद्विग्नता का स्वर मुखरित होता है।

शिक्षाग्रहण के प्रति उनमे अप्रतिहत इच्छा और आकांक्षा थी। उनका हिन्दी के प्रति अनुराग कितना व्यापक था, इसका ज्ञान और भान तब होता है जब उन्होंने किसी कान्वेण्ट स्कूल में अपने प्रवेश को लेकर अपना खुला विरोध प्रकट किया था, जिसके कारण इलाहाबाद मे बाई का बाग़-मुहल्ले मे 'ग्रैण्ड ट्रैंक रोड' (जी० टी० रोड) के मुख्य मार्ग पर स्थित क्रॉस्थवेट स्कूल में उन्हें प्रवेश कराया गया गया था। प्रवेश पाने के बाद महादेवी की साहित्य-साधना अबाध्य गति मे चलती रही। वहाँ वे वहाँ के छात्रावास में रहती थीं। वहाँ समाज के हर सम्प्रदाय, जाति, वर्गादिक की छात्राएँ रहती थीं, जिनमें पारस्परिक एकता था; सब सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहती थीं। ये सब देख-समझकर बालिका महादेवी के भीतर का एकान्त छँटता रहा। सुभद्रा कुमारी चौहान से उनकी भेंट उसी विद्यालय में हुई थी, तब महादेवी जी पाँचवीं और सुभद्रा जी सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं। मिडिल स्कूल में अध्ययन से पूर्व ही महादेवी जी का ध्यान बाह्य जीवन के दु:ख की ओर गया और तभी से 'अबला', 'विधवा' आदिक शीर्षक से शब्दचित्र स्थान पा चुके थे। स्कूल के छात्रावास में महादेवी जी बहुत कम बोलती थीं। वे गुमसुम बैठीं अध्ययन करती रहती थीं और अवकाश मिलने पर रचनाधर्मिता के साथ जुड़ जाती थीं।

हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध कवि श्रीधर पाठक की पुत्री ललिता पाठक के साथ उनका विशेष लगाव था। स्कूल में उनका जीवन 'बाल भगतिन'-जैसा था। वे अपनी इसी संकुचन की प्रवृत्ति के कारण कवि-सम्मेलनों मे अधिक भाग नहीं ले पाती थीं। विद्यापीठ और घर में बाहरी-भीतरी क्षेत्र की सीमाएँ रहीं। रचना-स्तर पर वे और सुभद्रा एकसाथ रहती थीं। उन्होंने लिखा था, "जब बाकी बच्चे बाहर खेलते थे, तब मैं और सुभद्रा पेड़ पर बैठकर अपने रचनात्मक विचारों को एक साथ बैठकर व्यक्त करते थे... वह खड़ीबोली मे लिखती थीं और जल्द ही मैंने भी खड़ीबोली में लिखना शुरू कर दिया... इस तरह हम हर दिन एक या दो कविताएँ लिख लेते थे...'' उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय स्नातक और संस्कृत-साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधियाँ अर्जित की थीं।

वे इलाहाबाद से प्रकाशित क्रान्तिकारी पत्रिका 'चाँद' में वर्ष १९३१ से वर्ष १९३४ तक लिखती रहीं, जिनमें से २१ निबन्धों का संकलन नारी की स्थिति, अधिकार, कार्यक्षेत्र, व्यवसाय, समस्याओं तथा समाज में नारी की स्थिति का अमूल्य दस्तावेज़ है। साहित्यिक परिवार से इलाहाबाद मे आनेवाले साहित्यकारों के लिए तो उनका निवास 'घर'-जैसा ही था; किन्तु अन्य अतिथियों के लिए भी उनका द्वार मुक्त रूप से खुला ही रहता था।

मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था,"मेरी प्रयाग-यात्रा केवल संगम-स्नान से पूरी नहीं होती; उसको सर्वथा सार्थक बनाने के लिए मुझे सरस्वती (महादेवी) के दर्शन के लिए प्रयाग महिला विद्यापीठ जाना पड़ता है। संगम में कुछ फूल-अक्षत चढ़ाना पड़ता है। सरस्वती मन्दिर में कुछ प्रसाद मिलता है। 'साहित्यकार संसद्' हिन्दी के लिए उन्हीं का प्रसाद है।" 'महाप्राण' उपाधियुक्त सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने उनकी 'हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती' के नाम से प्रतिष्ठा की थी। वे निराला जी को अपना भाई मानती थीं, जिसका निर्वहण करते हुए, वे आजीवन निराला जी की कलाइयों मे राखी बाँधती रहीं।

उनकी रचनाशीलता में वेदना का जो अजस्र रस फूटा, उसने उन्हें 'आधुनिक मीराँ' ('मीरा' अनुपयुक्त है; क्योँकि राजस्थानी बोली मे 'मीराँ' का ही प्रयोग होता है। मीराँबाई राजस्थानी ही थीं।) की उपाधि से भी समलंकृत किया था। उनकी महती स्थापना हिन्दी-साहित्य मे छायावादी-युग के अन्तर्गत प्रसाद-पन्त-निराला के अनन्तर चतुर्थ स्तम्भ के रूप मे रही है।

महादेवी जी का रचनापक्ष अज्ञात प्रियतम के प्रति एक प्रकार के गूढ़ प्रेम और जिज्ञासा से परिपूर्ण संलक्षित होता था। वह अज्ञात प्रियतम उनका 'परमात्मा' होता था। वे निसर्ग के सुकोमल रूपों का जिस कमनीयता के साथ प्रस्तुत करती थीं, वह मन को मुग्ध कर लेता था। यही कारण है कि उनके सर्जन में परमात्मा और प्रकृति (निसर्ग) के प्रति प्रेम का जो निदर्शन प्राप्त होता है, वह दुर्लभ है।

महादेवी जी विविध आयोजनो में जीवन पक्ष, सामाजिक पक्ष, सामाजिक प्रतिक्रिया तथा सामाजिक मूल्यों आदिक विषयों पर विशद (सुस्पष्ट) और विस्तृत (बृहद्) चर्चा करती थीं। यह एक अलग विषय है कि वे नितान्त अन्तर्मुखी थीं; विरोध को जीती आ रही थीं और प्रतिकार करने की क्षमता भी विकसित कर लेती थीं। ऐसा नहीं देखा गया कि वे समकालीन साहित्यकारों में इतनी घुली-मिली रही हों अथवा घुल-मिल जाती रही हों। हाँ, वे सभी का समादर करती थीं। यही कारण है कि जब भी कोई बाहर का साहित्यकार इलाहाबाद आता था, वह महादेवी जी से मिलने की अभिलाषा को प्राथमिकता देता था। इलाहाबाद के सभी प्रसिद्ध साहित्यकार उनसे भेंटकर, तत्कालीन काव्य-परिदृश्य पर संवाद-परिसंवाद अवश्य करते थे; उनसे दिशा-निर्देश की चाह रखते हुए, मिलनेवाले साहित्यकार-लेखक, कवि-कवयित्री, पत्रकार, समीक्षक आदिक उनकी ओर से कभी निराश नहीं होते थे। इलाहाबाद-स्थित अशोकनगर नामक मुहल्ले मे उनका निवास 'साहित्यकार-संसद्' के रूप में विख्यात रहा।

निराला जी की भाँति वे भी किसी साहित्यकार का अपमान 'स्वयं' का अपमान समझती थीं। आर्थिक परिस्थिति से विक्षिप्त निराला जी को महल में रखने का उनका स्वप्न 'साहित्यकार- संसद्'-निर्माण से पूर्ण हुआ था। यह अलग बात है कि 'साहित्यकार-संसद्' वर्तमान में 'विवाद' का विषय बना हुआ है और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसका निर्माण कराया गया था, वह अब पूरी तरह से इलाहाबाद और बाहर के साहित्यकारों को खुला अँगूठा दिखा रहा है। उस ट्रस्ट की सम्पत्ति को कुछ लोग अपनी सम्पदा मानकर स्वेच्छाचारिता का परिचय दे रहे हैं और स्वयं को साहित्यकार-कवि माननेवाले लोग 'गांधी जी के तीन बन्दर' का चरित्र जीते आ रहे हैं।

बहरहाल, महीयसी महादेवी वर्मा ने अपनी सारस्वत लेखनी से इलाहाबाद-सहित शेष भारत को शब्दधर्मिता का जो गुण-धर्म दिया है, वह कविता, कहानी, शब्दचित्र, निबन्ध इत्यादिक विषयों के रूप में अमरत्व को प्राप्त कर चुका है।

(लेखक, जाने-माने व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी हैं।)

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