काशी की गलियों की देवनागरी अब डिजिटल टाइप में दिखेगी, BHU प्रो. मनीष अरोड़ा समेत तीन शोधकर्ताओं का पेपर चयनित
काशी की वर्नैक्युलर और बहुभाषी लेटरिंग पर आधारित शोध-पत्र ‘टाइपडे कोच्चि-2026’ में प्रस्तुति के लिए चुना गया है।
वाराणसी, 28 सितंबर। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी की गलियों, बाजारों, धार्मिक स्थलों और शहरी परिवेश में दिखाई देने वाली हाथ से बनी देवनागरी और बहुभाषी लेटरिंग अब डिजिटल टाइप की दुनिया में भी अपनी जगह बनाएगी। काशी की यह विशिष्ट दृश्य-संस्कृति केवल स्थानीय पहचान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके पीछे मौजूद दृश्य-भाषा और डिजाइन सिद्धांतों को आधुनिक डिजिटल टाइपोग्राफी के संदर्भ में समझने और विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण शोध सामने आया है।
“फ्रॉम काशी स्ट्रीट्स टू डिजिटल टाइप: अ प्रैक्टिस-लेड स्टडी ऑफ वर्नैक्युलर एंड मल्टीलिंग्वल लेटरिंग इन वाराणसी” शीर्षक से तैयार शोध-पत्र का चयन ‘टाइपडे कोच्चि-2026’ में प्रस्तुति के लिए किया गया है। कार्यक्रम का आयोजन 28 से 30 सितंबर 2026 तक कोच्चि में हो रहा है।
तीन शोधकर्ताओं का संयुक्त अध्ययन
यह शोध तनिषा वाधवानी, सहायक प्रोफेसर, फाइन आर्ट्स विभाग, सीएसजेएम विश्वविद्यालय, कानपुर; प्रो. मनीष अरोड़ा, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, व्यवहारिक कला विभाग, दृश्य कला संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय; तथा अभिषेक वर्धन सिंह, अंतरविषयी सुलेखकार एवं शोधकर्ता, द कैलिग्राफी फाउंडेशन, द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
काशी की वर्नैक्युलर टाइपोग्राफी पर केंद्रित शोध
शोध का मुख्य केंद्र काशी की वर्नैक्युलर टाइपोग्राफी, विशेष रूप से हाथ से लिखी और हाथ से पेंट की गई देवनागरी लेटरिंग है। शोधकर्ताओं ने यह समझने का प्रयास किया है कि स्थानीय संस्कृति, भाषा, वास्तुकला, सामग्री, व्यापार, धार्मिक परंपराओं और रोजमर्रा के शहरी जीवन ने काशी में अक्षर-रचना के स्वरूप को किस प्रकार प्रभावित किया है।
अध्ययन में अक्षरों के स्ट्रोक, अनुपात, स्पेसिंग, रिद्म, रंग, अलंकरण और भौतिक परिवेश को विश्लेषण की प्रमुख इकाइयों के रूप में देखा गया है।
फोटो संग्रह से आगे बढ़कर ‘प्रैक्टिस-लेड’ पद्धति
शोध की खासियत यह है कि इसे केवल फोटोग्राफी या दृश्य-संग्रह तक सीमित नहीं रखा गया है। शोधकर्ताओं ने प्रैक्टिस-लेड मेथडोलॉजी प्रस्तावित की है, जिसमें किसी लेटरिंग को उसके वास्तविक परिवेश में देखने और दर्ज करने के बाद उसका विश्लेषण, हाथ से पुनर्निर्माण, दृश्य अमूर्तीकरण, डिजिटल रूपांतरण और नए डिजाइन प्रयोग किए जाते हैं।
पेपर में इस पूरी प्रक्रिया को आठ चरणों—ऑब्जर्व, डॉक्युमेंट, एनालाइज़, एब्स्ट्रैक्ट, री-ड्रॉ, डिजिटाइज़, टेस्ट और री-कन्सेप्चुअलाइज़—के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
देवनागरी और अंग्रेजी का ‘विजुअल नेगोशिएशन’
प्रो. मनीष अरोड़ा के अनुसार, शोध का एक महत्वपूर्ण पक्ष काशी के सार्वजनिक और व्यावसायिक परिवेश में देवनागरी और अंग्रेजी के सह-अस्तित्व का अध्ययन है। शहर में दोनों लिपियां अनेक स्थानों पर एक साथ दिखाई देती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह केवल भाषाई अनुवाद का मामला नहीं है, बल्कि एक प्रकार का ‘विजुअल नेगोशिएशन’ है। इसमें दोनों लिपियों की संरचनात्मक पहचान को बनाए रखते हुए आकार, स्थिति, दृश्य भार, रंग, पदानुक्रम और रिद्म के माध्यम से एक साझा दृश्य व्यवस्था तैयार होती है।
संकेत-पट्टों में दिखता है भाषा और स्थान का संबंध
शोध-पत्र में काशी के एक बहुभाषी पर्यावरणीय संकेत का उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया है, जिसमें देवनागरी और अंग्रेजी को एक साथ व्यवस्थित किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऐसे संकेत केवल सूचना देने वाले बोर्ड नहीं होते, बल्कि वे स्थान, वास्तुकला, भाषा और दर्शक की गति के बीच संबंध भी निर्मित करते हैं। शोध-पत्र के पृष्ठ 5-6 पर प्रस्तुत उदाहरण इसी अवधारणा को स्पष्ट करता है।
डिजिटल फॉन्ट से पहले स्थानीय डिजाइन-बुद्धि को समझने पर जोर
अध्ययन की मौलिकता इस बात में है कि शोधकर्ता काशी की लेटरिंग को सीधे डिजिटल फॉन्ट में बदलने के बजाय उसके पीछे मौजूद स्थानीय दृश्य-बुद्धि और डिजाइन सिद्धांतों को समझने पर जोर देते हैं। शोध में कहा गया है कि डिजिटल रूपांतरण महज तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। इसमें चयन, व्याख्या, सरलीकरण और पुनर्संदर्भीकरण जैसे चरण शामिल होते हैं। ऐसे में स्थानीय लेटरिंग को उसकी सांस्कृतिक और भौतिक पृष्ठभूमि से अलग कर केवल व्यावसायिक शैली के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय उसके मूल दृश्य सिद्धांतों को समझना जरूरी है।
काशी को ‘लिविंग टाइपोग्राफिक हैबिटेट’ के रूप में देखने का प्रस्ताव
शोध-पत्र के निष्कर्ष में काशी को केवल एक ऐतिहासिक शहर या दृश्य संदर्भ के रूप में देखने के बजाय ‘लिविंग टाइपोग्राफिक हैबिटेट’ के रूप में समझने का प्रस्ताव रखा गया है। यहां अक्षर लोगों, सतहों, भाषाओं, व्यापार, धर्म और सांस्कृतिक स्मृति के साथ निरंतर संवाद करते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, काशी की गलियों से डिजिटल टाइप तक की यात्रा को ‘एक्स्ट्रैक्शन’ नहीं, बल्कि ‘ट्रांसलेशन’ के रूप में देखा जाना चाहिए। यही दृष्टिकोण स्थानीय दृश्य-संस्कृति को डिजिटल टाइपोग्राफी में रूपांतरित करते समय उसकी सांस्कृतिक पहचान और संदर्भ को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।