गैरकानूनी रुप से हिरासत में रखे गए व्यापारी को रिहा करने का आदेश
गैरकानूनी रुप से हिरासत में रखे गए व्यापारी को रिहा करने का आदेश
प्रयागराज, 07 जुलाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना ने अचल कुमार गुप्ता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर उनकी हिरासत को पूरी तरह अवैध करार दिया और तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
जेल प्रशासन ने तकनीकी कारणों का हवाला देकर याची को रिहा नहीं किया। इसी बीच मेरठ के थाना गंगानगर में दर्ज केस में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ द्वारा जारी बी-वारंट पर याची को 10 फरवरी 2026 को मेरठ जेल में रिमांड पर भेज दिया गया। बाद में गाजियाबाद के मुकदमे में भी एक और बी-वारंट पर उसे वहां भी रिमांड पर लिया गया।
न्यायालय ने कहा कि याची को हिरासत में रखना,न्यायिक आदेश का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत जारी रिट सीधे जेल प्रशासन पर बाध्यकारी होती है, इसके लिए मजिस्ट्रेट के अलग आदेश की आवश्यकता नहीं होती। एक बार जब व्यक्ति की हिरासत गैरकानूनी घोषित हो जाए, तो बी-वारंट उसे दोबारा हिरासत में रखने का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि बी-वारंट केवल पहले से वैध हिरासत में रह रहे व्यक्ति की पेशी के लिए होता है, न कि किसी मुक्त व्यक्ति को हिरासत में लेने का प्राधिकार होता है।
न्यायालय ने यह भी पाया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में याची को नहीं दिए गए, जो अनुच्छेद 22(1) और धारा 47 का उल्लंघन है। इस आधार पर भी गिरफ्तारी अवैध है।
पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा याची की पुत्री को कथित रूप से परेशान किए जाने और धमकाए जाने की बात भी रिकॉर्ड पर आई, जिस पर कोर्ट ने संबंधित इंस्पेक्टर को तलब भी किया था।
न्यायालय ने मेरठ और मुकदमा गाजियाबाद एवं गौतमबुद्ध नगर में याची की निरंतर हिरासत को अवैध घोषित करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि यह आदेश भविष्य में किसी वैध प्रक्रिया के तहत याची की गिरफ्तारी पर रोक नहीं लगाता।