सरकारी जमीन पर बनीं 18 दुकानों के दुकानदारों को बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर कहा- सार्वजनिक भूमि पर निजी अधिकार नहीं

बांदा के बबेरू में सड़क और मरघट के नाम दर्ज सरकारी भूमि पर बने दुकान परिसर को हटाने के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि पर लंबे कब्जे या निर्माण में खर्च के आधार पर निजी अधिकार नहीं बन सकता।

सरकारी जमीन पर बनीं 18 दुकानों के दुकानदारों को बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर कहा- सार्वजनिक भूमि पर निजी अधिकार नहीं

प्रयागराज, 11 सितंबर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बांदा जिले के नगर पंचायत बबेरू स्थित एक दुकान परिसर को हटाए जाने के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका खारिज कर दी है।

सुधीर कुमार तिवारी सहित 17 अन्य दुकानदारों ने नगर पंचायत के कार्यपालक अधिकारी और चेयरमैन द्वारा 3 अगस्त 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दुकानों को गिराने का निर्देश दिया गया था।

याचियों का कहना था कि नगर पंचायत ने भूखंड पर दो मंजिला दुकान परिसर बनवाकर वर्ष 2010 से 2019 के बीच अलग-अलग समय पर उन्हें प्रीमियम और वार्षिक किराए पर दुकानें आवंटित की थीं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने सुरक्षा राशि जमा की, किराया चुकाया और दुकानों की साज-सज्जा में निवेश किया, और यही दुकानें उनकी आजीविका का साधन हैं।

दूसरी ओर, राज्य सरकार व नगर पंचायत की ओर से तर्क दिया गया कि यह निर्माण राजस्व अभिलेखों में सड़क (गाटा संख्या 680) और मरघट (गाटा संख्या 769) के रूप में दर्ज सरकारी भूमि पर खड़ा है। बबेरू चौराहे के चौड़ीकरण और सड़क-सुरक्षा कार्यों के लिए यह कार्रवाई की गई थी। नगर पंचायत के अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया।

न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने पाया कि विवादित भूमि राज्य की संपत्ति है और नगर पंचायत को इसे पट्टे पर देने का कोई अधिकार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 की धारा 293(1) नगर पंचायत को ऐसी भूमि आवंटित करने का अधिकार नहीं देती जो उसके वैध निस्तारण के दायरे में न हो।

कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि पर लंबे समय से कब्जे या निर्माण पर हुए खर्च के आधार पर निजी अधिकार स्थापित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा 18 याचियों में से केवल दो के आवंटन-पत्र रिकॉर्ड पर थे और अधिकांश दुकानदारों के नोटिस के बाद स्वेच्छा से दुकानें खाली करने की बात सामने आई, जिससे याचिका की सद्भावना पर भी सवाल उठे रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि याचियों को पर्याप्त अवसर दिए गए और आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही आदेश पारित किया गया। अतः 3 अगस्त 2026 का आदेश हस्तक्षेप योग्य नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कोई खर्च अधिरोपित नहीं किया।