हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी पूर्व कांस्टेबल की सजा को किया रद्द, बरी

संदेह से परे, नहीं साबित हो सका अपराध, 15 साल बाद मिला न्याय

हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी पूर्व कांस्टेबल की सजा को किया रद्द, बरी

प्रयागराज, 20 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गुरुवार को वर्ष 2011 में अलीगढ़ की अदालत द्वारा दुष्कर्म के मामले में सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी पूर्व पुलिस कांस्टेबल रतन सिंह को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी रतन सिंह उस समय थाना चंदौस में तैनात था और पीड़िता के चचेरे भाई बृजेश कुमार के घर आना-जाना रखता था। आरोप था कि उसने पारिवारिक परिचय का लाभ उठाकर नाबालिग पीड़िता के साथ बार-बार दुष्कर्म किया और शादी का झांसा दिया। सितंबर 2005 में जब पीड़िता की चिकित्सा जांच कराई गई तो पता चला कि वह करीब तीन माह की गर्भवती है, जिसके बाद मामला उजागर हुआ और एफआईआर दर्ज कराई गई।

अलीगढ़ के अपर सत्र न्यायाधीश ने 28 मार्च 2011 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी करार देते हुए 10 साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

बचाव पक्ष के वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि घटना के करीब 18 दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। एफआईआर में पिस्तौल दिखाकर धमकाने या मुंह दबाने जैसी बातों का कोई जिक्र नहीं था, जबकि बाद में ये आरोप जोड़े गए। चिकित्सकीय जांच में पीड़िता के शरीर पर कोई चोट या संघर्ष का निशान नहीं मिला। पीड़िता के पिता, दादी और अन्य पारिवारिक गवाहों के बयान जांच अधिकारी ने दर्ज ही नहीं किए। स्कूल रजिस्टर के अनुसार पीड़िता की जन्मतिथि 1 मई 1983 थी, यानी घटना के समय उसकी उम्र लगभग 22 वर्ष थी, नाबालिग होने का दावा साबित नहीं हुआ।

राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता का बयान और गर्भावस्था की पुष्टि अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन करती है।

अदालत ने कहा कि केवल पीड़िता के बयान के आधार पर सजा दी जा सकती है, बशर्ते वह पूरी तरह विश्वसनीय हो। लेकिन मौजूदा मामले में परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए संदेह उत्पन्न होता है , जैसे शरीर पर चोट न होना, पिता की मौजूदगी संदिग्ध होना, कथित पिस्तौल और कपड़े की बरामदगी न होना, और महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ न होनकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब घटना की वास्तविक प्रकृति संदिग्ध हो, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।

इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अलीगढ़ की निचली अदालत का फैसला रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने आरोपी को दो माह के भीतर संबंधित अदालत में जमानत बॉन्ड जमा करने का निर्देश भी दिया।