43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, तीन आरोपियों को किया बरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में तीन आरोपियों को किया बरी
प्रयागराज, 21 अक्टूबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है लेकिन उसे बिना जांचे-परखे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। उसकी गवाही की विश्वसनीयता, सच्चाई और परिस्थितियों के अनुरूप होने का आकलन करना जरूरी है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने यह टिप्पणी फतेहपुर के 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में की। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास, प्राथमिकी दर्ज कराने में छह दिन की देरी और गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियां पाते हुए तीन आरोपिताें की दोषसिद्धि निरस्त कर उन्हें बरी कर दिया।
मामले के अनुसार, 17 अक्टूबर 1983 की रात फतेहपुर के बिंदकी क्षेत्र में दो महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया गया था। इनमें एक महिला दूसरी की भाभी थी, जबकि दूसरी उसकी ननद थी। आरोप था कि चार नामजद आरोपित दो अन्य व्यक्तियों के साथ उनके घर में घुसे और तमंचा दिखाकर परिवार के सदस्यों को धमकाते हुए वारदात को अंजाम दिया। घटना के छह दिन बाद 23 अक्टूबर 1983 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। निचली अदालत ने 22 अप्रैल 1985 को आरोपिताें को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी, पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास, घटना के समय पहने गए कपड़ों को पुलिस को उपलब्ध नहीं कराने और चिकित्सकीय साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि नहीं होने का मुद्दा उठाया। आरोपिताें ने पुरानी रंजिश के कारण झूठा फंसाए जाने का भी दावा किया।
उच्च न्यायालय ने पाया कि शुरुआती शिकायत में दो अन्य कथित आरोपिताें के नाम का उल्लेख नहीं था, जबकि बाद में उनकी भूमिका बताई गई। विवेचक ने भी गवाही में कहा कि पहली पीड़िता ने पूछताछ के दौरान उन दोनों के नाम नहीं बताए थे। दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटना के क्रम, आरोपिताें की भूमिका और परिवार के सदस्यों को रोकने के तरीके को लेकर भी महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं। घटना के समय पहने गए कपड़े भी पुलिस को नहीं सौंपे गए थे।
चिकित्सकीय परीक्षण में दोनों महिलाओं के शरीर पर कोई ताजा बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली थी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल चोट या चिकित्सकीय पुष्टि का अभाव यौन अपराध के आरोप को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी तरह, प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी भी अपने आप में अभियोजन के मामले को समाप्त नहीं करती। इस मामले में देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलने और अन्य साक्ष्यों में गंभीर विसंगतियां होने से अभियोजन की कहानी संदेह से परे साबित नहीं हो सकी।
न्यायालय ने कहा कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद होने पर अकेले उसके आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है। मगर जब मुख्य गवाहों के बयानों में ऐसे विरोधाभास हों, जो अभियोजन की मूल कहानी को प्रभावित करते हों, तो सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
इन्हीं आधारों पर उच्च न्यायालय ने सिराजुल, छोटेलाल और फक्कू की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें बरी कर दिया। मुख्य आरोपित मोहम्मद अनीस खान की अपील उसकी मृत्यु के कारण 16 मार्च 2026 को ही समाप्त हो चुकी थी।