वंदे मातरम में समाहित है राष्ट्र सेवा और साधना का संकल्प : प्रांत प्रचारक
वंदे मातरम में समाहित है राष्ट्र सेवा और साधना का संकल्प : प्रांत प्रचारक
लखनऊ, 15 फ़रवरी । उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रविवार काे बाबू बनारसी दास बैडमिंटन एकेडमी में वन्दे मातरम गीत की एक सौ पचासवीं जयंती पर समारोह का आयोजन किया गया। इसमें वंदे मातरम गायन संबंधी सरकार के निर्णय की सराहना की गई। समारोह को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक कौशल और राज्य सूचना आयुक्त डॉ दिलीप अग्निहोत्री ने संबोधित किया। अध्यक्षता सुनील बंसल और संचालन बाल भास्कर ने किया। इस अवसर पर वंदे मातरम्, स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका, शताब्दी वर्ष, पंच प्रण विषयों पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई गई।
इस अवसर पर प्रांत प्रचारक ने कहा कि वंदे मातरम गीत में राष्ट्र सेवा और साधना का संकल्प समाहित है। स्वतंत्रता संग्राम में यह शब्द असंख्य लोगों को प्रेरणा देता था। स्वतंत्रता संग्राम में इसका उद्घोष देशभक्ति की ऊर्जा का संचार करता था। अभी तक वंदे मातरम दो पद्य ही गाए जाते थे। अब पूरा वंदे मातरम गीत गाया जाएगा। उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह वंदे मातरम की प्रेरणा से ही राष्ट्र सेवा में सक्रिय हुए थे। संघ की शाखाओं में भी मातृभूमि की वंदना की जाती है। शताब्दी वर्ष के पंच प्रण भी वंदे मातरम की भाव भूमि से प्रेरित हैं। यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित किया था। इसके अगले चरणों में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का उल्लेख है।
डॉ दिलीप अग्निहोत्री ने कहा कि इस गीत में मातृभूमि की देवी रूप में आराधना की गई। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद देश में निराशा थी। उस समय वंदे मातरम ने जनमानस में आशा का संचार किया। इससे ब्रिटिश सत्ता भी परेशान हुई। वंदे मातरम् केवल एक शब्द नहीं बल्कि यह ऊर्जा का संचार करने वाला मंत्र है। यह भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति है।