हाईकोर्ट ने युवा जोड़ों की शादी की जांच कर उनका पीछा करने के पुलिस कृत्य की कड़ी आलोचना की
हाईकोर्ट ने युवा जोड़ों की शादी की जांच कर उनका पीछा करने के पुलिस कृत्य की कड़ी आलोचना की
प्रयागराज, 24 अप्रैल । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा कि पुलिस स्वेच्छा से शादी करने वाले युवा जोड़ों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके और उनका पीछा करके बहुत बड़ा नुकसान कर रही है।
कोर्ट ने कहा कि, अन्य अपराधों की जांच करने के बजाय पुलिस द्वारा सहमति से हुए विवाहों के मामलों में एफआईआर दर्ज करने और जांच करने की ’चिंताजनक प्रवृत्ति’ को रेखांकित करते हुए, न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने इस निर्देश के साथ याचिकाकर्ता दम्पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह किसी बालिग व्यक्ति को बताए कि वह कहां रहेगा या किसके साथ रहेगा, शादी करेगा या अपना जीवन व्यतीत करेगा। न्यायालय ने आगे कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक को अब यह संदेश दिया जाना चाहिए कि वयस्कता की आयु का सम्मान किया जाना चाहिए और साथ ही संवैधानिक संस्कृति का भी।
मामले के अनुसार एक युवा दम्पति ने लड़की के पिता द्वारा लड़के के खिलाफ धारा 87 बीएनएस के तहत दर्ज कराई गई एफआईआर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। लड़की ने अपनी मर्जी से लड़के से शादी की है।
हालांकि, पिता के लापता होने की रिपोर्ट मिलने पर पुलिस ने तत्काल एफआईआर दर्ज की और दम्पति की तलाश शुरू कर दी। मामले के तथ्यों के साथ-साथ उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी और याचिका के साथ दायर किए गए विवाह प्रमाण पत्र पर ध्यान देते हुए, पीठ ने टिप्पणी की कि गुमशुदगी की शिकायत के लिए पुलिस को एफआईआर दर्ज नहीं करनी चाहिए थी। लड़की से बातचीत करने के बाद, जिसने संकेत दिया कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है, खंडपीठ ने एफआईआर को “दोनों याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर अतिक्रमण“ करार दिया।
पिता के साथ-साथ आम जनता को भी कड़ा संदेश देते हुए, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान किसी भी वयस्क को, चाहे रिश्ता कैसा भी हो, कानून के तहत बालिग माने जाने वाले दूसरे वयस्क की इच्छा पर हावी होने या शासन करने की अनुमति नहीं देता है। इसी प्रकार के मामलों में पुलिस की भूमिका पर आपत्ति जताते हुए, पीठ ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की और कहा : “बेशक, नाबालिग बच्चे का मामला अलग है। पुलिस इस तरह की एफआईआर दर्ज करके और उससे भी बढ़कर, युवा जोड़े का पीछा करके, कभी-कभी उन्हें जबरन अलग करने और दुल्हन को उसके माता-पिता या परिवार के पास वापस भेजने के गुप्त इरादे से, घोर अन्याय कर रही है। ये सभी कार्य पूरी तरह से गैरकानूनी हैं और इनमें से कुछ अपराध हैं।“
हाईकोर्ट ने इसी के साथ डीजीपी को ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए और एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने लड़की के पिता सहित प्रतिवादियों को याचिकाकर्ताओं के वैवाहिक घर में प्रवेश न करने या किसी भी तरह से उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन को बाधित न करने का आदेश जारी किया है।