टीबी समझकर शुरू कर दी दवा, जांच में निकली दूसरी बीमारी
टीबी समझकर शुरू कर दी दवा, जांच में निकली दूसरी बीमारी
लखनऊ, 24 जुलाई केवल एक्स-रे और लक्षणों के आधार पर टीबी (क्षय रोग) का इलाज शुरू करना मरीजों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। राजधानी के सिविल अस्पताल में रोजाना ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहां मरीजों को टीबी न होने के बावजूद उसकी दवाएं दी जा रही हैं जबकि कई वास्तविक टीबी मरीजों का इलाज दूसरी बीमारियों के नाम पर चलता रहता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी की पुष्टि के लिए एक्स-रे के साथ बलगम जांच, सीबी-नॉट, जीन एक्सपर्ट, सीटी स्कैन और मरीज की चिकित्सीय पृष्ठभूमि जरूर पता करनी चाहिए।
एक्स-रे के भरोसे टीबी का इलाज खतरनाक
राजधानी के अहिमामऊ निवासी 46 वर्षीय प्रेमचंद को लगातार खांसी, सांस फूलने और वजन घटने की शिकायत पर एक निजी चिकित्सक ने एक्स-रे में धब्बे देखकर टीबी की दवा शुरू कर दी। एक सप्ताह तक दवा लेने के बावजूद हालत में सुधार नहीं हुआ। बाद में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल में विस्तृत जांच के दौरान पता चला कि उन्हें टीबी नहीं, बल्कि फेफड़ों में गांठ (लंग नोड्यूल) की समस्या है। इसके बाद टीबी की दवा बंद कर दी गई।
30 प्रतिशत मामलों में एक्स-रे गलत
सिविल अस्पताल के वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष दुबे के अनुसार, एक्स-रे में दिखाई देने वाला हर धब्बा टीबी का कारण नहीं होता। फेफड़ों का कैंसर, गांठ, अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस और टीबी के एक्स-रे कई बार एक जैसे दिखाई देते हैं। लगभग 30 प्रतिशत मामलों में केवल एक्स-रे के आधार पर किया गया आकलन गलत साबित होता है। इसलिए जरूरी जांच के बाद टीबी की पुष्टि होने पर ही इलाज शुरू किया जाना चाहिए।
90 प्रतिशत मरीज हो रहे ठीक
डॉ. दुबे ने बताया कि सिविल अस्पताल में हर महीने 150 से 200 नए टीबी मरीज और 2 से 3 मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी के मामले सामने आते हैं। उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष 15 से 17 हजार एमडीआर टीबी के मरीज मिलते हैं। हालांकि समय पर पहचान, जांच और इलाज के कारण टीबी से ठीक होने की दर अब 90 प्रतिशत अधिक हो चुकी है और प्रति लाख आबादी पर मरीजों की संख्या भी घटकर 200 से नीचे पहुंच गई है।
एक टीबी मरीज 15 लोगों को कर सकता है संक्रमित
उन्होंने बताया कि एक अनुपचारित टीबी मरीज प्रतिवर्ष 15 अन्य लोगों को संक्रमित कर सकता है। यदि मरीज बीच में दवा छोड़ देता है तो एमडीआर टीबी विकसित हो सकती है। एमडीआर का इलाज भी अधूरा छोड़ दिया जाए तो एक्सडीआर टीबी जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका इलाज करीब दो वर्ष तक चलता है।
इन जीवाणुओं पर दवाएं बेअसर
क्षय रोग विशेषज्ञ ने बताया कि टीबी के जीवाणु चार तरह के होते हैं। रेपिड ग्रोवर्स (तेजी से बढ़ने वाले), इन्फ्रासेलुलर (कोशिका के भीतर) सेल वॉल (कोशिका भित्ति पर) और डारमेंट ग्रुप आफ बेसिलाई (सुप्त जीवाणुओं का समूह)। दवाओं से पहले तीन तरह के जीवाणु मर जाते हैं, लेकिन चौथे पर दवाएं बेअसर हो जाती हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर ये जीवाणु सक्रिय होकर पनपने लगते हैं।
छह महीने तक जिंदा रहता है टीबी का जीवाणु
उन्होंने बताया कि टीबी का जीवाणु बंद, अंधेरे और नम वातावरण में छह महीने तक सक्रिय रह सकता है, जबकि धूप में भी लगभग एक महीने तक जीवित रहता है। टीबी का संक्रमण मरीज के खांसने या छींकने से निकलने वाली संक्रमित बूंदों के जरिए हवा में फैलता है।
इन जिलों में टीबी के सबसे ज्याद मरीज
डॉक्टर का कहना है कि उत्तर प्रदेश में आगरा, फिरोजाबाद, कानपुर, वाराणसी, लखनऊ और प्रयागराज में टीबी के सबसे अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं।
बीमारी दूसरी, दवा टीबी की
विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार सही और पर्याप्त जांच के बिना मरीजों को टीबी की दवाएं शुरू कर दी जाती हैं, जबकि उन्हें बीमारी होती ही नहीं। वहीं, टीबी के मरीजों का दूसरी बीमारी समझकर इलाज चलता रहता है। ऐसे मामलों में कैंसर और आईबीएस के मरीजों को भी टीबी की दवाएं दिए जाने की बात सामने आई है।
लोहिया संस्थान में ईबीयूएस से टीबी की सटीक जांच
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों की पहचान के लिए अत्याधुनिक एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड (ईबीयूएस) तकनीक से जांच सुविधा शुरू हो चुकी है। श्वसन रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वर्मा ने बताया कि ईबीयूएस के जरिए रोगी के मुंह के रास्ते एक पतली ट्यूब डालकर फेफड़ों के अंदर की लाइव तस्वीरें देखी जाती हैं। इस प्रक्रिया में चीरा या सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। इस तकनीक की मदद से टीबी, फेफड़ों के कैंसर और छाती में लिम्फ नोड्स से जुड़ी बीमारियों की शुरुआती स्तर पर सटीक पहचान संभव होगी।
लखनऊ में साढ़े तीन साल में मिले टीबी मरीज
वर्षवार टीबी मरीज
2023 - 8631
2024 - 9317
2025 - 11185
2026 - 9370
नोट : 2026 के आंकड़ों में 100 दिवसीय अभियान में मिले टीबी रोगी शामिल हैं।