प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर इलाहाबाद HC बार एसोसिएशन सख्त, CM को पत्र लिखकर की 6 बड़ी मांगें
जानिए क्या है वकीलों की CM से मांग
प्रयागराज (Prayagraj News Digital Media): नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों की मनमानी और किताबों के नाम पर होने वाली खुली लूट एक बार फिर चर्चा में है। अभिभावकों को हर साल नई किताबें खरीदने और निर्धारित दुकानों से ही खरीदारी करने के दबाव से अब निजात मिलने की उम्मीद जगी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन, प्रयागराज ने इस गंभीर मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है और तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे स्कूल
बार एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रदेश के अधिकांश प्राइवेट स्कूल अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाल रहे हैं। स्कूलों द्वारा हर साल किताबों के नए संस्करण (Edition) अनिवार्य कर दिए जाते हैं, जबकि असल में सिलेबस में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता। सिर्फ कुछ अध्यायों (Chapters) में मामूली हेरफेर करके नई किताबें लागू कर दी जाती हैं।
इसके अलावा, स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को किसी एक विशेष विक्रेता (दुकानदार) से ही किताबें और ड्रेस खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और अभिभावकों को कमीशनखोरी के चलते मनमाने दाम चुकाने पड़ते हैं।
HC बार एसोसिएशन ने CM से की ये 6 प्रमुख मांगें
एसोसिएशन ने इसे आम परिवारों और अभिभावकों के साथ अन्यायपूर्ण बताते हुए सरकार से निम्नलिखित 6 ठोस कदम उठाने की अपील की है:
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कीमतों पर नियंत्रण: निजी विद्यालयों द्वारा चलाई जा रही किताबों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम बनाए जाएं।
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मोनोपोली पर रोक: स्कूलों द्वारा अभिभावकों को किसी विशेष विक्रेता से ही किताबें खरीदने के लिए बाध्य करने की प्रथा पर तत्काल रोक लगाई जाए।
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5 साल का नियम: किताबों के सेट (सिलेबस) को कम से कम 5 वर्षों तक अपरिवर्तित (Unchanged) रखने के लिए स्पष्ट नियम निर्धारित किए जाएं।
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मामूली बदलाव के नाम पर खेल बंद हो: केवल आंशिक (चैप्टर स्तर) परिवर्तन के आधार पर हर साल नई किताबें अनिवार्य करने की प्रथा पर रोक लगे।
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कठोर कार्रवाई: नियमों का उल्लंघन करने वाले विद्यालय प्रबंधनों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।
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निगरानी तंत्र (Monitoring System): अभिभावकों के हितों की सुरक्षा और स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए एक प्रभावी निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
अभिभावकों में जगी राहत की उम्मीद
हाई कोर्ट के वकीलों द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद प्रयागराज सहित पूरे प्रदेश के अभिभावकों में एक उम्मीद जगी है। आम मध्यमवर्गीय परिवार हर साल हजारों रुपये सिर्फ नई किताबों पर खर्च करने में सक्षम नहीं होता। अब सबकी निगाहें राज्य सरकार और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं कि वे इस पत्र पर संज्ञान लेते हुए स्कूलों के खिलाफ क्या सख्त कार्रवाई करते हैं।
आपकी क्या राय है? क्या आपने भी अपने बच्चों की पढ़ाई के दौरान इस तरह की परेशानी का सामना किया है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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