न्यायिक अधिकारी की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर को हाईकाेर्ट ने किया रद्द, तलाक की एवज में पत्नी पर 01 करोड़ मांगने का आरोप
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ज्यूडिशियल ऑफिसर की एफआईआर रद्द कर दी
प्रयागराज, 21 अगस्त । तलाक के लिए पत्नी द्वारा एक करोड़ रुपये मांगने के आरोप में ज्यूडिशियल ऑफिसर की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को रद्द कर दिया है। उच्च न्यायालय ने मामले में एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी और तलाक की डिक्री पहले ही पारित हो जाने के बावजूद पत्नी पर तलाक की कार्यवाही में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाए जाने को महत्वपूर्ण विरोधाभास माना। प्राथमिकी थाना- नालेज पार्क, ग्रेटर नोएडा, गौतमबुद्ध नगर में दर्ज कराई गई थी।
जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार द्वितीय की खंडपीठ ने पत्नी और दो अन्य की ओर से दाखिल याचिका स्वीकार करते हुए इस साल जनवरी में दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों से प्रथम सूचना देने वाले की ओर से आपराधिक कार्यवाही को किसी अन्य उद्देश्य से शुरू कराए जाने की बात सामने आती है।
उच्च न्यायालय ने माना कि यह अभियोजन सद्भावनापूर्ण नहीं, बल्कि दुर्भावनापूर्ण और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। मामले में आरोप था कि पत्नी 26 मई 2021 से 18 नवंबर 2025 के बीच अलग-अलग मौकों पर कथित तौर पर तलाक के लिए सहमत नहीं हुई और एक करोड़ रुपये की मांग करती रही। हालांकि एफआईआर में इन घटनाओं के संबंध में कोई स्पष्ट दिन, तारीख या समय नहीं बताया गया था।
पत्नी ने एफआईआर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में कहा कि मामला काफी देर से दर्ज कराया गया और इस देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने भी माना कि एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया। कोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए 8 सितंबर 2025 को तलाक की डिक्री पारित की थी। इसके करीब चार महीने बाद 17 जनवरी 2026 को न्यायिक अधिकारी राहुल आनंद की तरफ से एफआईआर दर्ज कराई गई।
उच्च न्यायालय ने सवाल उठाया कि जब सक्षम अदालत पहले ही सितंबर 2025 में तलाक की डिक्री पारित कर चुकी थी तो एफआईआर में इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख क्यों नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि एफआईआर में पत्नी पर यह आरोप लगाया गया कि वह एक करोड़ रुपये की कथित मांग पूरी होने तक तलाक की कार्यवाही में सहयोग करने से इनकार कर रही थी। लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार एफआईआर दर्ज होने से कई महीने पहले ही सक्षम फैमिली कोर्ट तलाक की डिक्री पारित कर चुकी थी। कोर्ट ने इस तथ्य को एफआईआर में लगाए गए आरोपों के विपरीत माना।
उच्च न्यायालय ने कहा कि तलाक की डिक्री 8 सितंबर 2025 को पारित हो चुकी थी जबकि एफआईआर 17 जनवरी 2026 को दर्ज हुई। ऐसे में पत्नी द्वारा तलाक की कार्यवाही में सहयोग नहीं करने और उसके बदले एक करोड़ रुपये मांगने का आरोप रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों से मेल नहीं खाता। मामले में पहले पक्षकारों को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र भेजा गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि विवाद मूल रूप से निजी और वैवाहिक प्रकृति का है। हालांकि 20 जून 2026 की मध्यस्थता रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता नहीं हो सका। इसके बाद हाईकोर्ट ने एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की।
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम सूचना देने वाले ने किसी छिपे हुए उद्देश्य और बाहरी कारण से आपराधिक कार्यवाही शुरू कराई और यह अभियोजन कानून और तथ्यों की कसौटी पर कायम नहीं रह सकता। हाईकोर्ट ने ज्यूडिशियल ऑफिसर की ओर से दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की गई पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। एफआईआर भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 318(1), 115(2), 352, 308(6), 329(1), 324(4), 351(2) और 221 के तहत दर्ज की गई।