1987 से वेतन का दावा कर रहे मदरसा शिक्षकों को हाईकोर्ट से झटका, याचिका खारिज
1987 से वेतन न मिलने के मामले में शिक्षकों की याचिका हाईकाेर्ट में खारिज
प्रयागराज, 21 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को परवेज़ आलम व अन्य मदरसा अध्यापकों व स्टाफ की 1987 से बकाया वेतन भुगतान की मांग में दाखिल याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने यह आदेश दिया।
आज़मगढ़ स्थित मदरसा जमीयतुल कुरैश जलालंधरी में परवेज़ आलम, आफताब हुसैन, अरशद हुसैन (सहायक अध्यापक), मोहम्मद जावेद (क्लर्क) और मोहम्मद मुस्तफा (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) ने 1981 से 1987 के बीच नियुक्ति पाने का दावा किया था। उनका कहना था कि मई 1987 तक उन्हें वेतन मिलता रहा, लेकिन प्रबंध समिति में विवाद के बाद उनका वेतन रोक दिया गया, जबकि उनकी सेवा कभी औपचारिक रूप से समाप्त नहीं की गई।
याचिकाकर्ताओं ने 26.अगस्त.2003 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें संयुक्त निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने उनका वेतन दावा खारिज कर दिया था।
सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति निर्धारित भर्ती प्रक्रिया व विज्ञापन के बिना हुई थी। इसके अलावा, 28.जुलाई 2018 की प्रधानाचार्य रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने कभी संस्था में कार्य नहीं किया और उनके ज्वाइनिंग पत्रों पर प्रधानाचार्य के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए। "काम नहीं तो वेतन नहीं" के सिद्धांत के आधार पर तथा सरकारी आदेश दिनांक 21.नवंबर .2001 के अनुसार भी उनका दावा खारिज योग्य बताया गया।
न्यायालय ने कहा कि केवल मासिक विवरणी में नाम दर्ज होना या कुछ समय वेतन मिलना नियुक्ति की वैधता सिद्ध नहीं करता। याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि उनकी नियुक्तियां कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई थीं। न्यायालय ने माना कि सरकारी पत्र दिनांक 16.मार्च.2001 भी नियुक्तियों की वैधता का स्वतंत्र आधार नहीं बन सकता। इन आधारों पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।