कदाचार के लम्बित आरोपों के बावजूद वीआरएस आवेदन पर कार्रवाई की जानी चाहिए : उच्च न्यायालय

कदाचार के लम्बित आरोपों के बावजूद वीआरएस आवेदन पर कार्रवाई की जानी चाहिए : उच्च न्यायालय

कदाचार के लम्बित आरोपों के बावजूद वीआरएस आवेदन पर कार्रवाई की जानी चाहिए : उच्च न्यायालय

प्रयागराज, 13 नवम्बर  इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने अपने एक आदेश में कहा कि जब किसी कर्मचारी की चिकित्सकीय परेशानी के कारण अनुशासनात्मक जांच असंभव हो जाती है, तो उसके वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) के आवेदन पर लम्बित कदाचार के आरोपों के बावजूद कार्रवाई की जानी चाहिए।

याची कर्मचारी मनोहर सिंह अलीगढ़ स्थित दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में तकनीशियन ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत था। उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। साथ ही, अप्रैल 2022 में उसे एक बड़ी वसूली का आदेश भी मिला था। कर्मचारी ने विभागीय अपील दायर की, लेकिन बाद में फैसला बरकरार रखा गया। कर्मचारी ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। न्यायालय ने पाया कि कर्मचारी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। न्यायालय ने विभाग को अनुशासनात्मक कार्यवाही फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने निर्देश दिया कि कार्यवाही तभी शुरू की जाए जब एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए जो यह सत्यापित करे कि कर्मचारी मानसिक रूप से स्वस्थ है या नहीं और जाँच का सामना करने के लिए तैयार है या नहीं।

मेडिकल बोर्ड ने कर्मचारी की जांच की। बोर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारी को कई ब्रेन स्ट्रोक के कारण गंभीर शारीरिक अक्षमताएं थीं। इसलिए, वह बातचीत करने या कार्यवाही को ठीक से समझने में असमर्थ था। इसलिए, कर्मचारी की पत्नी ने जुलाई 2024 में चिकित्सा आधार पर उसकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) के लिए आवेदन किया। जब विभाग ने आवेदन पर कार्रवाई नहीं की, तो कर्मचारी ने फिर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

एकल न्यायाधीश ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली और विभाग को निर्देश दिया कि वह लंबित कदाचार के आरोपों से प्रभावित हुए बिना वीआरएस आवेदन पर कार्रवाई करे, क्योंकि उसकी स्वास्थ्य स्थिति के कारण निष्पक्ष जांच असंभव थी। इससे व्यथित होकर, विभाग ने हाईकोर्ट में दो जजों के समक्ष विशेष अपील दायर की।

अपीलकर्ता-विभाग ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने वीआरएस आवेदन पर कार्यवाही करने का निर्देश देने में त्रुटि की है। विभाग ने तर्क दिया कि मेडिकल रिपोर्ट के प्रामाणिकता और शुद्धता पर संदेह है। इसलिए, समन्वय पीठ ने कर्मचारी की वास्तविक मानसिक और शारीरिक स्थिति की पुष्टि के लिए एम्स, नई दिल्ली में उसकी पुनः मेडिकल जांच कराने का निर्देश दिया।

कर्मचारी का तर्क था कि कई स्ट्रोक के कारण गंभीर संज्ञानात्मक और शारीरिक अक्षमता सहित उसकी चिकित्सीय स्थिति के कारण वह किसी भी विभागीय जांच का सामना करने में असमर्थ है। इसलिए उसे सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अनुमति दी जानी चाहिए थी। कोर्ट ने पाया कि एम्स, नई दिल्ली की रिपोर्ट के बाद कर्मचारी की चिकित्सा स्थिति पूरी तरह से संदेह से परे स्थापित हो गई थी। रिपोर्ट में पुष्टि की गई थी कि कई स्ट्रोक के कारण उसे गंभीर शारीरिक और संज्ञानात्मक अक्षमताएं थीं, जिससे वह आरोपों को समझने या अनुशासनात्मक जांच में भाग लेने में असमर्थ था। इसलिए, कर्मचारी के विरुद्ध कोई जांच संभव नहीं थी।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि विभाग कर्मचारी के वीआरएस आवेदन पर उसके विरुद्ध पूर्व में लगाए गए आरोपों से प्रभावित हुए बिना कार्यवाही करे। कोर्ट ने एकल न्यायाधीश के निर्देश को बरकरार रखा। साथ ही, यह भी निर्देश दिया कि विभाग चार सप्ताह के भीतर वीआरएस आवेदन पर कार्रवाई करे। बेंच ने कार्यकारी अभियंता, दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड द्वारा दायर विशेष अपील को खारिज कर दिया।