गाजियाबाद बस विस्फोट 1996 : हाईकोर्ट ने बम विस्फोट के दोषी मोहम्मद इलियास की दोषसिद्धि रद्द कर दिया

--कहा, पुलिस के सामने दिया गया इकबालिया बयान अस्वीकार्य --हाईकोर्ट ने कहा, वह भारी मन से व्यक्ति को बरी करने का आदेश पारित कर रही है

गाजियाबाद बस विस्फोट 1996 : हाईकोर्ट ने बम विस्फोट के दोषी मोहम्मद इलियास की दोषसिद्धि रद्द कर दिया

प्रयागराज, 18 नवम्बर  । वर्ष 1996 के मोदीनगर-गाजियाबाद बस में बम विस्फोट मामले से संबंधित 51 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मोहम्मद इलियास नामक व्यक्ति की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में बुरी तरह विफल रहा और पुलिस द्वारा दर्ज किया गया उसका कथित इकबालिया बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत प्रतिबंध के मद्देनजर अस्वीकार्य है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने इलियास द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि पुलिस के समक्ष उसके इकबालिया बयान को हटा दिए जाने के बाद अपीलकर्ता के खिलाफ कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत नहीं बचा है।

कोर्ट ने अपने आदेश में सजा को रद्द करते हुए कहा कि कोर्ट “भारी मन से“ बरी करने का आदेश पारित कर रही है, क्योंकि यह मामला इतना गंभीर था कि इसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, क्योंकि इस ’आतंकवादी’ साजिश में 18 निर्दोष लोगों की जान चली गई।

दर्ज एफआईआर के अनुसार रुड़की डिपो की एक बस 27 अप्रैल 1996 को 15ः55 बजे दिल्ली से लगभग 53 यात्रियों को लेकर रवाना हुई थी। मोहन नगर में 14 और यात्री उसमें सवार हो गए।

शाम करीब पांच बजे, मोदीनगर पुलिस स्टेशन (गाजियाबाद) पार करते ही बस के अगले हिस्से में एक शक्तिशाली विस्फोट हुआ, जिससे 10 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और लगभग 48 यात्री घायल हो गए थे ।पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शवों में धातु के टुकड़े पाए गए थे और डॉक्टरों ने कहा कि मौतें बम विस्फोट के कारण हुए अत्यधिक रक्तस्राव, सदमे और रक्तस्राव के कारण हुईं।

फोरेंसिक जांच से पुष्टि हुई कि कार्बन के साथ मिश्रित आरडीएक्स को बस के अगले हिस्से में बाईं ओर, चालक की सीट के नीचे रखा गया था और विस्फोट रिमोट स्विच के माध्यम से किया गया था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि हमले को अब्दुल मतीन उर्फ इकबाल, एक पाकिस्तानी नागरिक और हरकत- उल-अंसार के कथित जिला कमांडर ने मोहम्मद इलियास (अपीलकर्ता) और तस्लीम के साथ साजिश में अंजाम दिया था।

यह भी आरोप लगाया गया कि इलियास (अपीलकर्ता), जो मूल रूप से मुजफ्फरनगर का रहने वाला है, लेकिन लुधियाना में रहता है, उसको जम्मू-कश्मीर के तत्वों द्वारा बहकाया गया था और उसने बम रखने की साजिश रची थी। 2013 में ट्रायल कोर्ट ने सह-आरोपी तस्लीम को बरी कर दिया था, लेकिन इलियास (अपीलकर्ता) और अब्दुल मतीन को धारा 302/34, 307/34, 427/34, 120-बी, 121-ए, 124-ए आईपीसी और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4/5 के तहत दोषी ठहराया। दोनों को आजीवन कारावास के साथ-साथ विभिन्न कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई। तस्लीम की बरी के खिलाफ़ राज्य सरकार ने कोई अपील दायर नहीं की। इस बारे में भी कोई जानकारी नहीं है कि अब्दुल मतीन ने अपील दायर की थी या नहीं। इसलिए, हाईकोर्ट ने केवल इलियास की अपील पर ही सुनवाई की।

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा इलियास द्वारा कथित रूप से दिए गए इकबालिया बयान की स्वीकार्यता का था। जून 1997 में लुधियाना में गिरफ्तारी के बाद, पुलिस ने दावा किया था कि इलियास ने अपने पिता और भाई की मौजूदगी में बम लगाने की बात कबूल की थी। यह बयान सीबी-सीआईडी के एक सेक्टर अधिकारी, आईओ ने एक ऑडियो कैसेट पर रिकॉर्ड किया था। लेकिन इसकी वैधता की जांच करने से पहले, खंडपीठ ने कहा कि 34 अभियोजन पक्ष के गवाहों की जांच की गई थी, जिनमें घायल यात्री, प्रत्यक्षदर्शी, जांच गवाह, चिकित्सा गवाह और कई जांच अधिकारी शामिल थे।

कोर्ट ने आगे कहा गया कि हालांकि यात्रियों और प्रत्यक्षदर्शियों ने घटना को साबित कर दिया, लेकिन कोई भी यह नहीं पहचान सका कि विस्फोटक किसने रखा था, क्योंकि बम बस के आईएसबीटी दिल्ली से रवाना होने से पहले ही रखा गया था, जिससे पहचान असंभव हो गई। खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिन गवाहों को न्यायेतर स्वीकारोक्ति सुनने के लिए कहा गया था, वे अपने बयान से मुकर गए तथा उन्होंने ऐसी किसी भी स्वीकारोक्ति से इनकार किया या विरोधाभासी बयान दिए। अब, पुलिस के समक्ष इलियास के इकबालिया बयान की स्वीकार्यता के प्रश्न के संबंध में, पीठ ने कहा कि इलियास द्वारा कथित तौर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (पीडब्लू-11) के समक्ष दिया गया ऑडियो-रिकॉर्डेड इकबालिया बयान अस्वीकार्य है।

इस प्रकार कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को खारिज कर दिया कि टाडा अधिनियम की धारा 15 के तहत, पुलिस अधीक्षक के पद से नीचे के पुलिस अधिकारी के समक्ष किया गया इकबालिया बयान स्वीकार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि टाडा का प्रभाव समाप्त हो चुका था और इस प्रकार, उसने कहा कि टाडा की धारा 15 के तहत प्रदत्त विशेष अपवाद, जो पुलिस के इकबालिया बयान को साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देता था, इस मामले पर लागू नहीं होता।

अभियोजन पक्ष यह आरोप साबित करने में बुरी तरह विफल रहा है कि अपीलकर्ता ने सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर बस में बम विस्फोट करने के लिए बम लगाने की साजिश रची थी, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में यात्रियों की जान चली गई और वे घायल हो गए तथा सार्वजनिक संपत्ति यानी इस बस को नुकसान पहुंचा। कोर्ट ने कहा निचली अदालत द्वारा दर्ज दोषसिद्धि के निष्कर्ष और अपीलकर्ता को दी गई सजा को खारिज किया जाना चाहिए ।

परिणामस्वरूप, न्यायालय ने 2013 के फैसले को रद्द कर दिया और आदेश दिया कि इलियास को तत्काल रिहा किया जाए, जब तक कि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो और रिहाई के बाद उसे सीआरपीसी की धारा 437-ए के तहत व्यक्तिगत बांड और दो जमानतें प्रस्तुत करनी होंगी। बरी होने के बावजूद, पीठ ने मामले की प्रकृति पर दुःख व्यक्त किया।

हाईकोर्ट ने कहा “हम इस मामले में भारी मन से बरी होने का फैसला दर्ज कर रहे हैं, क्योंकि यह मामला इतना संगीन है कि इसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया है, क्योंकि आतंकवादी साजिश में 18 निर्दोष लोगों की जान चली गई। “

मोहम्मद इलियास अपील के लम्बित रहने के दौरान हिरासत में रहा था। उसको सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।