बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार व ध्यान देने से सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम का खतरा

—यह सिंड्रोम एक परवरिश संबंधी विकृति,बच्चे अपने परिजनों पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं

बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार व ध्यान देने से सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम का खतरा

वाराणसी,2 नवम्बर । अपने बच्चों को अत्यधिक लाड़ प्यार देने के साथ उसका ध्यान रखना भी उन्हें मानसिक विकार की ओर ढ़केलना है। कहा भी जाता है कि अत्यधिक लाड़ प्यार देने से बच्चे बिगड़ जाते हैं । वहीं,उनमें सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम का खतरा भी बढ़ जाता है। यह समस्या आजकल एकल परिवारों में दिख रही है। इसमें बच्चे को छह वयस्कों (दादा-दादी, माता-पिता व नाना-नानी) से अत्यधिक लाड़-प्यार व ध्यान मिलता है, जिससे उनमें हकदारी की अत्यधिक भावना, अहंकार व निराशा को सहन न कर पाने जैसे लक्षण विकसित होते हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)के सर सुंदर लाल चिकित्सालय के एआरटीसी के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ मनोज कुमार तिवारी ने सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम की चुनौतियों को 'हिन्दुस्थान समाचार' से बातचीत में साझा किया। उन्होंने बताया कि सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम बढ़ती सामाजिक चुनौती बन गई है। इस सिंड्रोम का मूल चीन की 'एक-बच्चा नीति' में निहित है। दुनिया भर में एकल बच्चों के पालन-पोषण के तरीके से भी यह समस्या जुड़ी है। उन्होंने बताया कि बच्चा परिवार का केंद्र बन जाता है सभी वयस्क बच्चे की हर मांग को पूरा करने की कोशिश करते हैं। चीन में इसे ‘छोटे सम्राट का सिंड्रोम’ कहा जाता है। भारत में भी बढ़ती संपन्नता, छोटे परिवार का चलन व महत्वाकांक्षी पालन-पोषण ने ऐसी ही स्थितियां पैदा कर रहीं हैं। आजकल एक या दो बच्चे होने पर माता पिता, दादा-दादी, नाना-नानी (6 पाॅकेट) सारा दुलार एक बच्चे पर ही लुटाते हैं।

इस समस्या से ग्रसित बच्चों के लक्षणों में बच्चे छोटे-छोटे कामों जैसे अपना बैग उठाना या जूते पहनना, पेंसिल रबर लेना के लिए भी दूसरों पर निर्भर होते हैं। इस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे में धैर्य बिल्कुल नहीं होता, किसी भी चीज़ का इंतज़ार नहीं कर पाते और अपनी हर इच्छा तुरंत पूरा करवाना चाहते हैं। इससे पीड़ित बच्चे अपनी चीज़ें दूसरों को नहीं देना चाहते हैं। जब चीज़ें उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं तो वे जल्दी व अत्यधिक गुस्सा हो जाते हैं या रोते हैं। ऐसे बच्चों को हर काम के लिए प्रशंसा की ज़रूरत होती है। ऐसा बच्चा अस्वीकृति, इनकार या आलोचना को सहन नहीं कर पाता है। ऐसे बच्चे असफलता और सहपाठियों के दबाव का सामना करने के दौरान स्वायत्तता एवं मानसिक दृढ़ता के साथ संघर्ष करता है। वे प्यार को भौतिक पुरस्कार से जोड़ते हैं व तत्काल संतोष की उम्मीद करते हैं। धैर्य, सहानुभूति व आत्म-नियंत्रण की क्षमता कम होती है। ऐसे समस्या से ग्रस्त बच्चे वरिष्ठजनों व सामाजिक शिष्टाचार के प्रति कम सम्मान दिखाते है।

—ऐसी स्थिति में क्या करें

डॉ मनोज तिवारी बताते है कि पीड़ित बच्चों की आवश्यकताओं को तार्किक ढंग से पूरा करें,बच्चों के पालन पोषण में लाड़ प्यार के साथ पुरस्कार व दंड का समुचित प्रयोग करें। बच्चों को अपनी कुछ जिम्मेदारियां खुद लेने के लिए प्रोत्साहित करें। उन्हें 'ना' भी बोलें। निराशापूर्ण स्थितियों का सामना उन्हें खुद करने दें, सीमाएं निर्धारित करें और उनका पालन खुद भी करें और बच्चे से भी कराऐं, अनावश्यक प्रशंसा के बजाय उनके अच्छे प्रयास और अच्छे व्यवहार को प्रोत्साहित करें। ऐसे बच्चों को यह समझाने की जरूरत होती है कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते हैं। उनकी कुछ ताकत व कुछ कमजोरियां होती हैं। बच्चों को पॉकेट मनी के नाम पर ज्यादा पैसे और आजादी न दें ऐसा करने से बच्चे जिद्दी बनते हैं। बच्चों को दूसरों की सुनने की आदत डालें। गलती करने पर बच्चे को उसका अहसास करवाऐं व माफी मांगना सिखाएं। बच्चों को खास सुविधाएँ तभी दें, जब वे अपना कार्य संपन्न करें। इससे ‘मुझे इनाम मिलना ही चाहिये’ जैसी मानसिकता से बचाव किया जा सकता है। सहानुभूति, सहयोग व नागरिक उत्तरदायित्व सिखाने के लिये उनकी उम्र व योग्यता के अनुसार कार्य दें।

सामूहिक गतिविधियाँ व सामुदायिक सहभागिता का अवसर दें जो सामाजिक उत्तरदायित्व और सामाजिक मूल्यों के विकास में सहायक होता है। डॉ मनोज ने बताया कि सिक्स पॉकेट सिंड्रोम एक परवरिश संबंधी विकृति है जिसे परिवार के सदस्यों के सहयोग से दूर किया जा सकता है । आवश्यक होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श व सहयोग से इसे आसानी से दूर किया जा सकता है।