470वें मुड़िया महोत्सव का भव्य शुभारंभ, मुड़िया संतों ने सिर मुंडवाकर निभाई गुरु-शिष्य परंपरा

470वें मुड़िया महोत्सव का भव्य शुभारंभ, मुड़िया संतों ने सिर मुंडवाकर निभाई गुरु-शिष्य परंपरा

470वें मुड़िया महोत्सव का भव्य शुभारंभ, मुड़िया संतों ने सिर मुंडवाकर निभाई गुरु-शिष्य परंपरा

मथुरा, 27 जुलाई । धार्मिक नगरी गोवर्धन में सोमवार को गुरु-शिष्य परंपरा का एक अनुपम उदाहरण देखने को मिला। चैतन्य महाप्रभु संप्रदाय के मुड़िया संतों ने अपनी सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए मुंडन संस्कार कराया। गोवर्धन स्थित प्राचीन श्री श्याम सुंदर मंदिर परिसर में संतों ने अपने सिर मुंडवाए और राधे-राधे व हरिनाम संकीर्तन के जयघोष के साथ अपने आराध्य गुरु श्रीपाद सनातन गोस्वामी पाद की स्मृति को नमन किया। श्रीपाद सनातन गोस्वामी की स्मृति में मनाए जा रहे 470वें मुड़िया महोत्सव का शुभारंभ चैतन्य महाप्रभु मंदिर में अधिवास महोत्सव के साथ हो गया है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से आए गौड़ीय वैष्णव संतों और श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है।

चैतन्य महाप्रभु मंदिर के महंत गोपाल दास ने जानकारी दी कि वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, संत मुंडन कराकर मुड़िया संत के रूप में गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा व्यक्त कर रहे हैं। मुंडन के पश्चात संत भव्य शोभायात्राओं में शामिल होकर हरिनाम संकीर्तन के साथ गोवर्धन में गिरिराज महाराज की सप्तकोसीय परिक्रमा कर रहे हैं। महोत्सव के दौरान प्रतिदिन प्रातः राधा-श्याम सुंदर मंदिर और सायंकाल महाप्रभु मंदिर से भव्य शोभायात्राएं निकाली जा रही हैं।

ब्रज की प्राचीन पांडुलिपियों के अनुसार, जीवन के अंतिम समय में वृद्धावस्था के कारण जब श्रीपाद सनातन गोस्वामी गिरिराज जी की परिक्रमा करने में असमर्थ हो गए, तो उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गिरिराज शिला प्रदान की थी। ऐसी मान्यता है कि इस शिला की परिक्रमा करने से संपूर्ण गिरिराज परिक्रमा का पुण्य प्राप्त होता है, जो आज भी वृंदावन के राधा दामोदर मंदिर में दर्शनार्थ विराजमान है। सन 1556 में सनातन गोस्वामी के गोलोक गमन के पश्चात उनके शिष्यों और गौड़ीय संतों ने मुंडन कराकर उनके पार्थिव शरीर के साथ हरिनाम संकीर्तन करते हुए गिरिराज जी की परिक्रमा की थी। तभी से गुरु पूर्णिमा पर मुंडन कर परिक्रमा करने की यह परंपरा शुरू हुई, जो ब्रज में मुड़िया पूर्णिमा के नाम से प्रसिद्ध हो गई। समय के साथ यह परंपरा एक विशाल धार्मिक मेले का रूप ले चुकी है, जिसमें आज करोड़ों श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ शामिल होते हैं। इस वर्ष भी यह ऐतिहासिक महोत्सव पारंपरिक धार्मिक आयोजनों, हरिनाम संकीर्तन और शोभायात्राओं के साथ अत्यंत श्रद्धा व भक्ति के वातावरण में मनाया जा रहा है।