हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने को गलत व शून्य ठहराया
हाईकोर्ट ने कहा, जब डबल बेंच ने प्रावधान को असंवैधानिक करार दे रखा है तो आदेश कैसे दिया गया
प्रयागराज, 26 जून । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को टालने और ग्राम प्रधानों को छह महीने के लिए प्रशासकों की नियुक्ति को सही नहीं माना है। इस संबंध में पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब पंचायत राज अधिनियम के संबंधित प्रावधान 12(3-।) को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने असंवैधानिक करार दे रखा है तो कैसे इस प्रावधान के तहत आदेश पारित किया जा सकता है।
यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया है। हाईकोर्ट में ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रधानों को प्रशासक रूप में बने रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अदालत ने पंचायत चुनाव टालने को असंवैधानिक बताया है। कोर्ट ने सरकार से ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट के साथ टाइमलाइन मांगी है। हालांकि कोर्ट ने अभी किसी तरह की कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासक नियुक्त करना डिवीजन बेंच के आदेश का उल्लंघन है जो अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर के रूप में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाने के लिए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य सरकार ने कोई आयोग गठित किया है तो उसकी जानकारी और अन्य विवरण कोर्ट में दाखिल करें। इसमें चुनाव होने की समय सीमा स्पष्ट रूप से बताई गई हो, प्रस्तुत करें। सहारनपुर से याचिकाकर्ता अरविंद राठौर की ओर से दाखिल की गई याचिका पर अदालत ने ये निर्देश दिया है। हाईकोर्ट में 13 जुलाई को दोपहर दो बजे मामले की अगली सुनवाई होगी।
मालूम हो कि यूपी में पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया है। 25 मई को सरकार ने आदेश जारी कर ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया है। याचिका में प्रशासकों को हटाकर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराए जाने की मांग की गई है।