हत्यारोप साबित होने पर ट्रायल कोर्ट को आरोप तय करने का अधिकार
हत्यारोप साबित होने पर ट्रायल कोर्ट को आरोप तय करने का अधिकार
प्रयागराज, 14 जनवरी । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा है कि विवेचना और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से प्रथमदृष्टया हत्या का आरोप साबित होता है तो ट्रायल कोर्ट को आरोप तय करने का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि एकत्र साक्ष्यों के अवलोकन से प्रथमदृष्टया यह संकेत मिलता है कि अपहृत व्यक्ति की हत्या कर उसके शव को ठिकाने लगाया गया है। ऐसे में ट्रायल कोर्ट की ओर से अपहरण के साथ हत्या और साक्ष्य मिटाने का आरोप तय करना पूरी तरह वैध है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने मंगल केशरवानी उर्फ पंकज कुमार केशरवानी एवं तीन अन्य की पुनरीक्षण याचिका खारिज़ करते हुए की।
याची के खिलाफ प्रयागराज के थरवई थाने में हत्या, अपहरण व साक्ष्य मिटाने के आरोपी में एफआईआर दर्ज की गई थी। अदालत ने पुलिस के आरोप पत्र को संज्ञान लेते हुए हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप भी तय किए। इस फैसले के खिलाफ याची ने पुनरीक्षण अर्जी की। उसके अधिवक्ता ने दलील दी कि घटना की एफआईआर केवल संदेह के आधार पर अपहरण में दर्ज की गई थी। न तो शव की बरामदगी हुई और न ही हत्या या साक्ष्य मिटाने के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया।
ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप तय करना अधिकार क्षेत्र से परे व मनमाना है। वहीं शिकायतकर्ता और राज्य की ओर से कहा गया कि जांच के दौरान दर्ज गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट है कि अपहृत व्यक्ति की हत्या कर शव नदी में फेंक दिया गया था। केवल 90 दिन की वैधानिक अवधि पूरी होने के कारण अपहरण में चार्जशीट दाखिल की गई, जबकि शव की बरामदगी के लिए जांच अब भी जारी है। आरोप मुक्ति का आवेदन पहले ही खारिज किया जा चुका है, जिसे चुनौती नहीं दी गई। इसी के साथ कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।