मजिस्ट्रेट की अनुमति बिना पुलिस जुआ अधिनियम की धारा 13 में जांच नहीं कर सकती : हाईकोर्ट

मजिस्ट्रेट की अनुमति बिना पुलिस जुआ अधिनियम की धारा 13 में जांच नहीं कर सकती : हाईकोर्ट

मजिस्ट्रेट की अनुमति बिना पुलिस जुआ अधिनियम की धारा 13 में जांच नहीं कर सकती : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 13 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा कि सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलने से जुड़ा सार्वजनिक जुआ अधिनियम, 1867 की धारा 13 के तहत अपराध गैर संज्ञेय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पुलिस मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जांच शुरू नहीं कर सकती और न ही बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है।

जस्टिस संजय कुमार पचौरी की कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए मिर्जापुर में दर्ज आपराधिक मामले और उससे जुड़े संज्ञान व सम्मन आदेश रद्द किया। कोर्ट ने यह आदेश लवकुश सिंह उर्फ उदय प्रताप सिंह की याचिका पर पारित किया।

मामला उस एफआईआर से जुड़ा था जिसमें पुलिस ने चार लोगों को ताश के पत्तों और नकदी के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस ने जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल किया, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया था। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम, 1961 के बाद धारा 13 के तहत अपराध में अधिकतम छह माह की सजा का प्रावधान है। उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि जिन अपराधों में तीन वर्ष से कम सजा का प्रावधान हो, वे गैर-संज्ञेय माने जाते हैं।

इस आधार पर यह कहा गया कि जांच अधिकारी मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना जांच शुरू ही नहीं कर सकता था। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(एल), 2(सी) और धारा 155(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि गैर-संज्ञेय अपराध में पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आदेश नहीं था जिससे साबित हो कि जांच शुरू करने से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति ली गई। अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रारम्भिक साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि कथित जुआ सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक स्थान पर खेला जा रहा था।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर भी सवाल उठाए और कहा कि मजिस्ट्रेट ने कानून और तथ्यों पर विचार किए बिना संज्ञान आदेश पारित किया। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने पूरा आपराधिक मामला और संज्ञान-सम्मन आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पिछले वर्ष हाईकोर्ट की एक पीठ ने धारा 13 के अपराध को संज्ञेय माना था।